शादी के बाद करियर छोड़ने का सवाल सिर्फ़ महिलाओं से ही क्यों किया जाता है?

शादी एक वह रिश्ता है जो दो लोगों के बीच एक साझा ज़िम्मेदारी से बनता है, फिर भी हमारे समाज में शादी के बाद महिलाओ की ज़िंदगी में अक्सर सबसे बड़ा बदलाव क्यों आता है?

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Dimpy Bhatt
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Why the question of leaving career after marriage asked only to women

Photograph: (freepik)

शादी एक वह रिश्ता है जो दो लोगों के बीच एक साझा ज़िम्मेदारी से बनता है, फिर भी हमारे समाज में शादी के बाद महिलाओ की ज़िंदगी में अक्सर सबसे बड़ा बदलाव क्यों आता है? उनके करियर, सपने और पहचान के बारे में पूछा जाने वाला पहला सवाल यही होता है की "अब तुम काम करोगी या घर संभालोगी?" कई महिलाएं आज भी शादी के बंधन में बंधते ही इस सवाल का सामना करती हैं। 

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शादी के बाद करियर छोड़ने का सवाल सिर्फ़ महिलाओं से ही क्यों किया जाता है?

घर की ज़िम्मेदारी 

आज भी समाज में यही माना जाता है कि घर और परिवार महिलाओ की जिम्मेदारी होती हैं। शादी के बाद अक्सर महिलाओ को ही घर चलाने की, बुज़ुर्गों और बच्चों की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी दी जाती है। इसी सोच की वजह से अक्सर महिलाओ से ही सबसे पहले नौकरी छोड़ने के बारे में पूछा जाता है।    

पुरुष के करियर को प्राथमिकता

शादी के बाद पुरुष  की नौकरी को "परिवार का सहारा" माना जाता है, जबकि महिलाओ के काम को अक्सर "ऑप्शनल" माना जाता है। यह धारणा बना दी गई है कि अगर किसी एक को समझौता करना पड़े, तो वह महिला ही होगी। इस गलत सोच से महिलाओ की वैल्यू और मेहनत कम हो जाता है।  

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सामाजिक दबाव 

यह सवाल अक्सर परिवार के अलावा रिश्तेदारों और समाज से भी उठता है। “घर और नौकरी दोनों कैसे संभालोगी?” यह एक ऐसा सवाल है जो धीरे-धीरे एक महिला के कॉन्फिडेंस को कमज़ोर कर देता है। इस स्ट्रेस की वजह से वह खुद पर शक करने लगती है। 

सपोर्ट सिस्टम की कमी

अगर महिलाओं को घर और ऑफिस पर बराबर मदद मिले, तो उन्हें परिवार और प्रोफ़ेशन में से किसी एक को चुनना नहीं पड़ेगा। लेकिन, फ़्लेक्सिबल वर्क, बच्चों की देखभाल और घर में शेयरिंग की कमी की वजह से यह टॉपिक और भी ज़रूरी हो गया है।   

सोच बदलने की ज़रूरत

आजकल महिलाएँ आत्मनिर्भर, पढ़ी-लिखी और अपने सपनों को लेकर जागरूक हैं। शादी उनके जीवन का एक हिस्सा है, पूरी पहचान नहीं। करियर छोड़ने का सवाल तभी खत्म होगा, जब शादी को बराबरी की साझेदारी माना जाएगा और दोनों की ज़िम्मेदारियाँ समान होंगी। अगर शादी का फैसला दो लोगों का होता है, तो समझौते की उम्मीद सिर्फ़ महिला से ही क्यों की जाती है? यह सोच बदले बिना, महिलाओं की बराबरी सिर्फ़ एक विचार ही बनी रहेगी।

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