भारत का स्वंतंत्रता संग्राम महिलाओं के योगदान के बिना अधूरा है। पुरुषों के लिए इन आंदोलनों का हिस्सा होना आसान था, लेकिन महिलाओं को आंदोलन तक पहुँचने से पहले ही समाज की अनगिनत बेड़ियों का सामना करना पड़ता था। इसके बाद भी कई भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी ने आज़ादी की लड़ाई में अपना अहम योगदान दिया, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

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आइये जानते हैं भारत की 10 महिला स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में (भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी) (female freedom fighters hindi)

1. कमला देवी चटोपाध्याय

कमलादेवी एक विचारक के तौर पर गाँधी या अंबेडकर से कम नहीं थी। इनकी रुचि जाति से लेकर थिएटर तक, हर विषय में थी पर इतिहास के पन्नों में इनका नाम कहीं खो गया है। वो कमलादेवी ही थी जिन्होंने महात्मा गाँधी से सत्याग्रह में औरतों को शामिल करने की माँग की थी। आज़ादी मिलने तक कमलादेवी कई बार जेल गयीं, कभी  गाँधी के नाम का नारा लगाते हुए नमक बेचने के लिए तो कभी भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए। 1928 में कमलादेवी ऑल इंडिया काँग्रेस कमिटी में एलेक्ट हुईं, 1936 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की प्रेसिडेंट बनी और 1942 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनके महिलाओं को मैटरनिटी लीव देने व उनके अनपेड लेबर को नज़रंदाज़ न करने की बात रखी।

2. सरोजिनी नायडू

‘भारत कोकिला’ सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं। इन्होेंने समाज की कुरीतियों के खिलाफ़ महिलाओं को जागरूक किया और लगातार आज़ादी के आंदोलनों में भाग लेती रहीं।ये भी काफी बड़ी भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं। राजनीति के अलावा सरोजिनी का लेखन में भी गहरा रुझान था। इन्होंने ‘द लेडी ऑफ़ लेक’ और ‘द बर्ड ऑफ़ टाइम जैसी कई पुस्तकें लिखी हैं।
इन्होंने जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में अपना ‘कैसर-ए-हिंद’ सम्मान लौटा दिया था। सरोजिनी उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल बनीं।

3. भीकाजी कामा

भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी  भीकाजी कामा ने भी आज़ादी के लिए काफी जोर लगाया। भीकाजी कामा विदेश में भारत का झण्डा फहराने वाली पहली महिला थी। उस समय भारत आज़ाद नहीं हुआ था और भारत के लिए ब्रिटेन का झण्डा इस्तेमाल किया जाता था। मैडम कामा को ये बात गवारा नहीं था इसलिए उन्होंने खुद भारत के लिए एक तिरंगा तैयार किया और उसे फहराया। भीकाजी 33 वर्ष अपनी बीमारी के चलते भारत से दूर रहीं पर दूर होकर भी उनका आज़ादी का सपना कायम रहा। वे यूरोप के अलग-अलग देशों में जाके भारत की स्वतंत्रता के नारे लगाती रहीं। इन्होंने पेरिस इंडियन सोसाइटी की स्थापना की और उसमें अपनी क्रांतिकारी मैगज़ीन ‘वंदे मातरम’ निकाली।

4. एनी बेसेंट

यूँ तो एनी बेसेंट का जन्म लंदन में हुआ था पर 1893 में भारत आने के बाद वे यहीं कि होकर रह गई। बेसेंट साल 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं। इन्होंने भारत में फ़ैली कुरीतियों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए ‘ब्रदर्स ऑफ़ सर्विस’ संस्था की स्थापना की और इसकी मदद से बाल विवाह और जातिवाद जैसे मुद्दों की कड़ी आलोचना की। इन्होंने ‘न्यू इंडिया’ अखबार के ज़रिये ब्रिटिश सरकार से भारत में सेल्फ रूल की माँग की। 1916 में बेसेंट ने भारत में होम रूल मूवमेंट की शुरुआत की।

5.  अरुणा आसफ़ अली

अरुणा आसफ़ अली ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी। इन्होंने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का झंडा फहरा कर युवाओ में जोश भरा था। 1930 के नमक सत्यग्रह के दौरान अरुणा ने भरी सभाओं को सम्बोधित किया, जिसके बाद वे जेल भी गयीं। 1932 में जेल में रहते हुए उन्होंने कैदियों के साथ हो रहे बुरे बर्ताव के विरोध में भूख हड़ताल कर डाली। अरुणा को भारतीय स्वंतंत्रता संग्राम की ‘ग्रांड ओल्ड लेडी’ भी कहा जाता है।

6. सुचेता कृपलानी

सुचेता एक पक्की गाँधीवादी थीं। इन्होंने कांग्रेस में महिला विंग की स्थापना की थी। सुचेता ने भारत छोड़ो आंदोलन में अपना भरपूर योगदान दिया और गाँधीजी की ग़ैर हाज़िरी में अहिंसा का मोर्चा सम्भाला। इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 1945 तक जेल में रखा गया। इनका योगदान इतना मुखर था कि 1946 में इन्हें संविधान सभा का सदस्य चुन लिया गया। इन्होंने 14 अगस्त की रात को संविधान सभा में ‘वंदे मातरम’ गाया था।

7.  लक्ष्मी सेहगल

लक्ष्मी सेहगल आज़ाद हिंद फौज में महिला रेजिमेंट ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ के कैप्टन के पद पर रहीं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस इनके हौसले से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भारतीय आर्मी में पहला महिला रेजिमेंट स्थापित कर डाला। वे आज़ाद हिंद फौज में महिला अधिकारों की मंत्री भी थी। उनके ऊपर महिलाओं को फ़ौज में भर्ती करवाने और उन्हें ट्रेनिंग देने की ज़िम्मेदारी थी। उन्होंने ये ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई और देखते ही देखते 500 महिलाओं ने रानी झाँसी रेजिमेंट जॉइन कर लिया। जिस समय औरतों का घर से बाहर निकलना भी बड़ी बात होती थी, उस समय लक्ष्मी मर्दों से कन्धा मिला कर आज़ादी की लड़ाई लड़ रही थीं।

8. विजयलक्ष्मी पंडित

विजयलक्ष्मी पंडित को नेहरू की बहन के रूप में जाना जाता है पर कम लोगों को पता है कि विजयलक्ष्मी सविनय अवज्ञा आंदोलन का हिस्सा रही हैं और आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों के लिए 1932-33, 1940 और 1942-43 में जेल भी गई हैं। 1937 में विजयलक्ष्मी को उत्तर प्रदेश के लेजिस्लेटिव असेंबली में एलेक्ट किया गया था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेज़ो के विरोध में इन्होंने इस पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। पंडित 1941 से 1943 के बीच अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्षा भी रहीं।

9. हंसा मेहता

हंसा मेहता पहली संविधान सभा की 15 महिला सदस्यों में से एक थीं। इन्होंने 1930 में गाँधीजी की सलाह पर महिला संघ का गठन किया और उनके साथ मिलकर बॉम्बे में अंग्रेज़ी कपड़ों और शराब की दुकानों के बाहर धरना दिया। इसके बाद से हंसा सक्रिय रूप से अंग्रेज़ों के खिलाफ़ प्रदर्शन करती रहीं। वे बॉम्बे कांग्रेस कमिटी की अध्यक्ष भी चुनी गयीं और 1932 में हरिजन सेवक संघ की उपाध्यक्ष बना दी गयीं। 1937 में चुनाव जीत कर हंसा ने बॉम्बे परिषद के शिक्षा एवं स्वास्थ्य विभाग के सचिव का पद सम्भाला। उनकी देख-रेख में शिक्षा नीति में कई ज़रूरी बदलाव आये।

10.  मातंगिनी हजरा

मातंगिनी हजरा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का तब तक हिस्सा रहीं जब तक ब्रिटिश भारतीय पुलिस ने उन्हें मार नहीं गिराया। पुलिस ने इन्हें तमलुक पुलिस स्टेशन के सामने गोली मारी, जिससे इनकी मृत्यु होगयी। मातंगिनी भारत छोड़ो आंदोलन के तहत पुलिस स्टेशन पर कब्ज़ा करने निकली थीं। उस वक़्त इनकी उम्र 71 वर्ष थी। कहा जाता है कि इन्होंने अंतिम साँस तक वंदे मातरम का नारा लगाया।

तो, सब थीं भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी जिन्होनें अपने देश के लिए जो कुछ भी उनसे बन पाया सब किया। ये थी भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी female freedom fighters hindi

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