International Women’s Day 2021: 10 महिला टीचर्स जिन्होंने भारत को एजुकेशन का महत्व समझाया

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Ayushi Jain

हम वे हैं जो हमारे टीचर्स ने हमें बनाया हैं। भारत के इतिहास में बहुत शक्तिशाली महिला टीचर्स हैं जिन्होंने मुश्किलों से लड़कर महिलाओं की आज़ादी और लड़कियों की शिक्षा के लिए काम किया है। यहां 10 भारतीय महिला टीचर्स की लिस्ट दी गई है जिन्होंने बाकी चीज़ों की जगह लर्निंग को प्रायॉरिटाइज़ किया और सवालों और आलोचनाओं का सामना करने के बावजूद भारत को आकार दिया।

जानिए 10 जानी-मानी भारतीय महिला टीचर्स के बारे में (bhartiya mahila teachers)

  1. विमला कौल

विमला कौल दिल्ली में अंडर प्रिविलेज्ड स्टूडेंट्स के लिए एक शिक्षिका बन गईं, जो स्कूल जानअ अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते थे। वह मानती हैं कि शिक्षा की जरूरत है और सभी को इसका लाभ उठाने का बराबर मौका मिलना चाहिए। उन्होंने कभी किसी ऐसे छात्र को नहीं छोड़ा जो सीखने में स्लो  था। उनके अनुसार, कई सरकारी स्कूल बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन देने में असफल रहते हैं और फिर नो-डिटेंशन पॉलिसी का पालन करते हैं। परिणामस्वरूप, छात्र या तो अंग्रेजी या हिंदी में बुनियादी वाक्यों का निर्माण करने में सक्षम नहीं हैं।

  1. सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई फुले अपने समय से बहुत आगे की महिला थीं। एक टीचर  होने के अलावा, वह एक मराठी लेखिका और एक परोपकारी भी थीं। उन्होंने ऐसे समय में लड़कियों को शिक्षित करने का जिम्मा उठाया जब जाति व्यवस्था कठोर थी और महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से दूर रखा जाता था। वह अपनी फॉर्मल एजुकेशन पूरी नहीं कर सकती थी क्योंकि वह एक छोटी जाति से थी। यह उनके पति ज्योतिराव फुले थे जिन्होंने उन्हें पढ़ाया था। फुले ने पुणे में भारत की सभी लड़कियों के स्कूल की स्थापना की, जिसके लिए उन्हें क्रिटिसाइज़ किया गया और यहां तक ​​कि उन पर पथराव किया गया।

  1. बेगम हमीदा हबीबुल्ला

बेगम हमीदा हबीबुल्ला ने व्हिटलैंड के कॉलेज, लंदन में एक टीचर के रूप में अपनी ट्रेनिंग प्राप्त की और छह दशकों तक भारत में एक शिक्षिका के रूप में काम करती रहीं। एक शिक्षक के रूप में हबीबुल्ला को उनके अपार योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने मार्जनलाइज़्ड सेक्शंस के छात्रों को शिक्षित करने का जिम्मा उठाया। उन्होंने ऐसी लड़कियों को भी पढ़ाया, जिन्हें आर्थिक संकट के कारण स्कूल जाना छोड़ना पड़ा। अपनी सास के साथ, हबीबुल्ला ने माइनॉरिटी सेक्टर से आने वाली लड़कियों के लिए एक स्कूल तालीमगाह-ए-निस्वां की स्थापना की। स्कूल तेजी से विकसित हुआ है और अभी यहाँ 3,500 से ज़्यादा बच्चे हैं।

  1. फातिमा शेख

फातिमा शेख सावित्रीबाई फुले की फोल्लोवर थीं। वह हमारे देश की पहली मुस्लिम महिला टीचर में से एक बन गईं। उनकी यात्रा शुरू हो गई क्योंकि उन्होंने फुले और शिक्षित दलित लड़कियों के साथ शामिल हो गईं। खुद मार्जनलाइज़्ड सेक्शन से आने के बाद उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। शेख शिक्षाविद के रूप में अपना करियर बनाने के लिए अपने परिवार के खिलाफ भी चली गई। वह चाहती थीं कि अधिक मुस्लिम महिलाएँ इस पेशे में शामिल हों और भारत में एक साइलेंट एजुकेशन रेवोल्यूशन के पीछे एक ड्राइविंग फाॅर्स बने।

  1. बेगम ज़फ़र अली

बेगम ज़फ़र अली कश्मीर की पहली महिला मैट्रिक पास थीं। वह एक एडुकेशनिस्ट, सोशल रिफॉर्मर और एक लेजिस्लेचर बनने के लिए बड़ी हुईं। बेगम अली ने विभिन्न स्कूलों में हेड मिस्ट्रेस का पद संभाला। उन्होंने महिला शिक्षा की खूबियों के बारे में लोगों को समझाया। उनका उद्देश्य महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करके उन्हें सशक्त बनाना था। बेगम ज़फ़र अली ने 1977-1982 तक विधान सभा के सदस्य के रूप में काम किया। उन्होंने शिक्षा में सुधार, महिलाओं की मुक्ति और अन्य सामाजिक मुद्दों पर एक एहम भूमिका निभाई।

  1. दुर्गाबाई देशमुख

दुर्गाबाई देशमुख एक फ्रीडम फाइटर थीं जिन्होंने गांधीवादी सिद्धांतों का पालन किया और महिलाओं को कढ़ाई और बुनाई में ट्रेन करने के लिए स्कूल स्थापित किए। अपनी M.A. और B.L. डिग्री पूरी करने के बाद  उन्होंने लड़कियों को पढ़ाने के लिए आंध्र महिला सभा ’की स्थापना की ताकि वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय मैट्रिक परीक्षा के लिए उपस्थित हो सकें। बाद में, ऑर्गनाइज़ेशन ने नर्सिंग, जर्नलिज्म और टीचिंग जैसी कई अन्य एक्टिविटीज के लिए महिलाओं को ट्रेन किया।

  1. महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा एक कवि, स्वतंत्रता सेनानी और एडुकेशनिस्ट थीं। उन्होंने हिंदी में कविताएँ लिखीं और आधुनिक हिंदी कविता में रोमांटिकतावाद के एक साहित्यिक आंदोलन छैवाड स्टाइल में एक्सेल किया। वर्मा ने प्रयाग महिला विद्यापीठ, इलाहाबाद की प्रिंसिपल और वाईस-चांसलर के रूप में काम किया।

  1. चंद्रप्रभा सैकियानी

असम में महिलाओं के आंदोलन को शुरू करने का श्रेय चंद्रप्रभा सैकियानी को दिया जाता है। उन्होंने खुद को और अपनी बहन को शिक्षित करने के लिए संघर्ष किया। चूंकि लड़कियों के लिए कोई स्कूल नहीं थे, इसलिए वह लड़कों के स्कूल में पढ़ने के लिए लंबी दूरी तय करती थीं। सैकियानी ने अन्य लड़कियों के सशक्तीकरण को सुनिश्चित करने के लिए 13 साल की उम्र में अपना पहला स्कूल शुरू किया। उन्होंने नागाँव मिशन स्कूल में पढ़ाई करने के लिए स्कॉलरशिप प्राप्त की और महिलाओं की शिक्षा के लिए कोशिश जारी रखी।

  1. अनुताई वाघ

अनुताई बाग भारत में प्रीस्कूल एजुकेशन की पाइयोनीर थी। उन्होंने एक इंडिजेनस करिकुलम पर ध्यान फोकस किया, जिसमें चीप एजुकेशन मटेरियल की आवश्यकता थी और जिसका उद्देश्य छात्रों को ओवरआल विकास प्रदान करना था। 1925 में, वाघ वर्नाक्युलर फाइनल परीक्षा में प्रथम स्थान पर रहे और 1929 में, उन्होंने पुणे में महिला ट्रेनिंग कॉलेज में प्राथमिक शिक्षक का सर्टिफिकेट कोर्स पूरा किया। महाराष्ट्र के चंदवाड़ तालुका के एक स्कूल में पढ़ाने के दौरान उन्हें रूढ़िवादी लोगों से जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। अनुताई वाघ ने बाद में एक नाइट स्कूल में दाखिला लिया और 51 वर्ष की आयु में मैट्रिक और ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। भारतीय महिला टीचर्स

रमाबाई रानाडे

रमाबाई रानाडे भारत की पहली महिला शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में से एक थीं। उन्होंने 11 साल की उम्र में शादी कर ली। उनके पति, एमजी रानाडे ने उन्हें शिक्षित होने के लिए प्रोत्साहित किया और उन्हें मराठी, अंग्रेजी और सोशल साइंस पढ़ाया। रमाबाई रानाडे ने एक हिंदू लेडीज सोशल क्लब की शुरुआत की, जिसने महिलाओं को सार्वजनिक बोलने और बुनाई में प्रशिक्षित किया। एक बार प्रार्थना समाज (उनके पति द्वारा स्थापित) और सेवा सदन की सदस्य के रूप में, उन्होंने महिलाओं की शिक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया और गरीब महिलाओं, विधवाओं और अबन्डोनड पत्नियों के लिए वोकेशनल और प्रोफेशनल ट्रेनिंग का आयोजन किया।

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