हमारे समाज के अनुसार लड़कियाँ या तो अच्छी हो सकती हैं या बिगड़ैल। “अच्छी लड़की” की श्रेणि में आने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं इसलिए बचपन से ही माँ-बाप लड़कियों की ट्रेनिंग शुरू कर देते हैं। हमें लड़कियों की तरह चलना, बोलना, हँसना सिखाया जाता है ताकि आगे चल कर यही चाल-चलन हमारा कैरेक्टर सर्टिफिकेट बन सकें।

अच्छी लड़कियों की परिभाषा में फ़िट होने के लिए लड़की को कटपुतली की तरह जीवन व्यतीत करना होता है। शादी होने तक माँ-बाप के इशारों पर नाचो और शादी के बाद पति के। “अच्छी लड़कियाँ” सेवा भावी होती हैं, उन्हें घर के सभी काम काज आते हैं, वे कभी किसी काम को ‘ना’ नहीं बोलतीं, वे समय पर घर आती हैं और उतना ही बोलती हैं जितना उन्हें बोलने को कहा जाता है। इसके मुकाबले “बुरी लड़की” होना आसान है। बस घर के सामने दो लड़के आ गये या स्लीवलेस पहन लिया और बन गयी लड़की बिगड़ैल। बुरी होने के लिए लड़की का बोल्ड होना ही काफ़ी है क्योंकि लोग हर लड़की में विवाह की पूनम देखना चाहते हैं, कुछ-कुछ होता है कि अंजली(पहले वाली) नहीं।

लड़कियों को “अच्छाई” छोड़ देनी चाहिए

मेरी माँ को हमेशा दूसरी औरतों से बेहतर बनने की होड़ लगी रहती है ताकि लोग उनकी तारीफ़ करें। अच्छा बनने के लिए माँ अपनी कैपेसिटी से दोगुना काम करती हैं और अपना दर्द कभी किसी से नहीं बतातीं। इससे दो तरह की परेशानियाँ होती हैं, एक तो उन्हें मशीन की तरह काम करना पड़ता है, दूसरा बाकी महिलाओं के प्रति प्रतिस्पर्धा की भावना बनी रहती है। इस तरह से “अच्छी स्त्री” ख़ुद से और बाकी स्त्रियों से दूर हो जाती है।

ऐसे ही मेरी एक सहेली अपने बॉयफ़्रेंड के साथ घूमते वक़्त मुँह पर कपड़ा बांधती है ताकि लोग उसे देख कर कैरेक्टरलेस न बोल दें। उसके लिए अपनी खुशी और आज़ादी से ज़्यादा ज़रूरी ये है कि लोग उसे किस नज़रिये से देखते हैं।

कागज़ पर लिखी आज़ादी लड़कियों के लाइफ का पार्ट कब बनेगा?

हम लड़कियों को देश की आज़ादी के साथ ही संवैधानिक तौर पर लिंग के आधार पर होते भेद-भाव से मुक्ति मिल गयी। कानून की नज़रों में सब बराबर और अपने हिसाब से जीने को स्वतंत्र हैं। संविधान के साथ-साथ समाज में भी महिलाओं को सशक्त बनाने की चेतना जगी। और उस समय से जो महिलाओ की आज़ादी की बात उठी, उस पर बहस आज भी कायम है। लेकिन आज महिला सशक्तिकरण के प्रचारकों के चिंता का विषय ये नहीं है कि लड़कियों को कोख़ में मारने की प्रथा कब बन्द होगी, बल्कि चर्चा तो इस बात पर है कि सशक्तिकरण के नाम पर लड़कियाँ हाथ से निकलने लगी हैं, कैरेक्टरलेस होने लगी हैं, इनका क्या किया जाए, कैसे रोका जाए?

ज़ाहिर है कि समाज लड़कियों की आज़दी से डरता है इसलिए हमें अच्छी लड़कियाँ बना कर रखने का हर सम्भव प्रयास करता है। अपनी बनाई ज़ंजीरों को समाज हमें कुछ इस तरह से पहनाता है कि वो हमें चूड़ियाँ नज़र आती हैं। हम लड़कियाँ इस मायाजाल को समझ नहीं पातीं और इसमें फँस जाती हैं।

खुद के लिए स्टेंड लेकर बुरा बनना बिल्कुल सही है

अगर पति की मार खाने से स्त्री अच्छी बन भी जाती हैं तो इसका क्या लाभ? इससे तो उनके खिलाफ़ रपट लिखवा कर बुरा बन जाना ही बेहतर है। कितनी ही लड़कियाँ अच्छी बनने की चाह में अपने साथ हुए दुर्व्यव्हार को छुपाये बैठी रहती हैं। जिन रिश्तेदारों ने अकेले में यौन शोषण किया हो, उनसे भी दुनिया के सामने मुस्कुरा कर मिलती हैं। गलतियाँ करने से इस कदर डरती हैं जैसे वो इंसान ही ना हों।

लड़के करें तो सही, लड़कियां करे तो करेक्टरलेस

समाज का दोगलापन तो देखिये, लड़कों का चाय की टपरी पर बैठ कर घण्टों बतियाना सही है लेकिन लड़की का पान की दुकान पर दो मिनट खड़ा होना भी उन्हें बेशर्म बना देता है। लड़के लेट से घर आएँ तो उन्हें मेहनती कहा जाता है और लड़कियाँ लेट आएँ तो आवारा हो जाती हैं। लड़के शॉर्ट्स पहने तो “गर्मी लगती होगी” और लड़कियाँ पहनें तो “शरीर दिखाना चाहती है”। अच्छाई और बुराई का पाठ केवल हमें पढ़ाया जाता है क्योंकि “लड़के तो लड़के होते हैं”।

लड़कियों को मर्दों द्वारा बनाई गई सीमाओं को लांघने की ज़रूरत है

समाज के बंधनों से मुक्त होने के लिए बुरा बनने की ज़रूरत है। अच्छी स्त्री आज के समय में उतनी ही ग़ैर ज़रूरी है, जितना उसे अच्छा बनाने वाला सिस्टम। स्त्री सशक्तिकरण तभी सम्भव है जब स्त्री विमुक्त हो वरना ये पुरुष प्रधान समाज अपनी ज़रूरत के मुताबिक स्त्री सशक्तिकरण की परिभाषा देता रहेगा और हम यूं ही पिसती रहेंगी। हमारी आज़ादी की कुंजी “बुरी स्त्री” बनने में है इसलिए लड़कियों को सीमाएं लाँघनी पड़ेंगी।

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