कोरोना वायरस के नए वेरिएंट्स RT-PCR टेस्ट को भी चकमा दे रहे हैं, जिसमें कई लोगों को कोरोना वायरस के लक्षण होने के बावजूद भी वे नेगेटिव आ रहे हैं। D-Dimer टेस्ट 
असफल RT-PCR टेस्ट की मौजूदा प्रवृत्ति को देखते हुए, डॉक्टर कई अन्य प्रभावी टेस्ट्स की मदद ले रहे हैं – डी-डायमर, CRP, इंटरल्यूकिन -6, जब लक्षणों वाले मरीजों की रिपोर्ट नेगेटिव आ रही है।

ये टेस्ट रोगियों में कोविड -19 संबंधित साइटोकिन स्टॉर्म प्रगति की निगरानी के लिए फायदेमंद है और मृत्यु दर को कम करने के लिए भी मेडिकल स्टाफ की मदद करता है।
डॉक्टरों का मानना है कि वायरस अब गले और नाक को छोड़कर फेफड़ों में एक कॉलोनी बना रहा है, जो बहुत खतरनाक संकेत हैं। दूसरी लहर में ब्लड के थक्के जमना जैसे नए और दुर्लभ लक्षण भी देखने को मिले हैं, तो ऐसे में उपर्युक्त टेस्ट्स की आवश्यकता होती है।

डी-डायमर टेस्ट क्या है? D-Dimer टेस्ट 

डी-डायमर फाइब्रिन डिग्रेडेशन प्रोडक्ट्स में से एक है। इसलिए जब शरीर का कोई अंग डैमेज हो जाता है या कहीं से खून बह रहा होता है, तो शरीर एक नेटवर्क बनाने के लिए वहां के सेल्स को आपस में जोड़कर ब्लीडिंग को रोकने की कोशिश करता है।

यह नेटवर्क फाइब्रिन नामक प्रोटीन से बनता है। इसलिए ब्लीडिंग वाली जगह पर कंपन एक साथ शुरू हो जाता है और खून का थक्का बन जाता है। ब्लड क्लॉटिंग फाइब्रिन के संकट के कारण होता है। जब हीलिंग हो जाती है, या जब शरीर को लगता है कि अब इसकी जरूरत नहीं है, तो वह फाइब्रिन को तोड़ना शुरू कर देता है। जब फाइब्रिन टूट जाता है, तो यह फाइब्रिन डिग्रेडेशन प्रोडक्ट या FDP बनाता है। FDP में से एक D-Dimer है।

हमें COVID के दौरान D-Dimer की आवश्यकता क्यों है?

इस टेस्ट से शरीर में ब्लड क्लॉट्स का पता चलता है जब COVID बहुत बढ़ जाता है। खासतौर पर, हमारे फेफड़ों में बहुत सारे क्लॉट्स बन जाते हैं, जिसकी वजह से फेफड़े सांस नहीं ले पाते हैं। क्लॉटिंग के कारण ब्लड सर्कुलेशन में भी रुकावट आती है।
तो, शरीर इन ब्लड क्लॉट्स को तोड़ने की कोशिश करता है। डी-डायमर बनने के 8 घंटे बाद तक पता लगाया जा सकता है, जब तक कि किडनी इसे साफ नहीं कर देती।

डी-डायमर के हाई या लो लेवल का क्या अर्थ है?

शरीर में डी-डायमर का हाई लेवल बताता है कि शरीर में बहुत अधिक ब्लड क्लॉट्स है, जो COVID से प्रभावित होने पर एक खतरनाक संकेत हो सकता है। इसलिए कोरोना वायरस कितना फैल गया है, यह पता लगाने के लिए डी-डायमर का उपयोग करते हैं और यदि मरीज को आगे चलकर ऑक्सीजन की आवश्यकता होने वाली है, क्योंकि उनका डी-डायमर जितना अधिक होगा, फेफड़ों में क्लॉट्स भी उतनी ही अधिक होगें और उन्हें ऑक्सीजन की आवश्यकता भी उतनी ही ज्यादा होगी।

** Disclaimer – यह सार्वजनिक रूप से एकत्रित की हुई जानकारी है। यदि आपको किसी विशिष्ट सलाह की आवश्यकता है, तो कृपया डॉक्टर से परामर्श करें।

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