सास-बहू का रिश्ता भले ही टीवी सीरियल्स जितना बुरा ना हो, लेकिन इस रिश्ते में कॉम्प्लिकेशन बहुत है। आज भले ही पहले के समय की तरह सास अपनी बहू पर ज़ुल्म ना करती हो पर इस रिश्ते में एक दूसरे से बेहतर बनने की रेस आज भी मौजूद है। आज भी सास अपने बेटे को बहू की तुलना में ज़्यादा महत्व देती हैं और बहुओं को कंट्रोल करने की कोशिश में लगी रहती हैं। इसी कोशिश में वे कुछ ऐसी बातें भी बोल जाती हैं, जो कोई भी मॉडर्न बहू नहीं सुनना चाहती।

जानिए क्या हैं वो 5 बातें जो सास को बहुओं से नहीं कहनी चाहिए –

1. “मैं अपने बेटे को जानती हूँ”

और मैं अपने पति को जानती हूँ! क्या मैं ये कह सकती हूँ? भारतीय माएँ इस बात पर गर्व करती हैं कि वे अपने राजा बेटों को कितनी अच्छी तरह जानती हैं। बेटों की पसंद, नापसंद, आदतें; ये सब माँओं को मुँह ज़बानी याद रहता है। लेकिन ये बात केवल कुछ हद तक सच है। हर माँ अपने दिल में यह जानती है कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वे गुप्त रूप से बढ़ते हैं और एक इंडीविज्वल एजेंसी विकसित करते हैं।

भारतीय बच्चों को भी अपने माता-पिता के सामने “आदर्श” बनने के दबाव से जूझना पड़ता है। जिसका मतलब है मेरी प्यारी मम्मी जी, कि आप भले ही ये सोचती हों कि आपका बेटा स्मोक नहीं करता है, ड्रिंक नहीं करता या शॉर्ट टेंपर्ड नहीं है; ये उस व्यक्ति के गुण नहीं हैं जिसके साथ मैं अपना बेड शेयर करती हूँ । तो कृपया मेरे पति की मेरी समझ को चुनौती न दें!

2. “बेशक, मर्द और औरत समान हैं लेकिन…. “

कोई भी मॉडर्न सास अपनी रिग्रेसिव सोच दिखाने से बचती है। लेकिन फिर पितृसत्ता से छुटकारा पाना इतना आसान तो है नहीं। यह हमारे स्वभाव में बसा हुआ है और अक्सर स्त्री की स्वतंत्रता पर नियम और शर्तों के रूप में सामाने आ ही जाता है। इसलिए एक आधुनिक सास अपनी बहू को नौ से पांच की नौकरी तो करने दे सकती है, लेकिन नौकरी से वापस आने के बाद उससे घर के काम करने की भी उम्मीद रखती है। बहू जींस और छोटी स्कर्ट पहन सकती है, लेकिन उसे अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवा चौथ भी रखना चाहिए। वह स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर सकती है, इंटरनेट का उपयोग कर सकती है, लेकिन फिर उसे फ़ैमिली व्हाट्सएप ग्रुप पर अपनी राय खुल कर नहीं रखनी चाहिए।

ये कैसा दोगलापन है? एक तरफ़ आप समानता की बात करती हैं और दूसरी तरफ़ अपने बेटे के किचन में जाने या कपड़े धोने पर चिढ़ जाती हैं। शादी में स्त्री और पुरुष तभी बराबर हो सकते हैं जब उनकी ज़िम्मेदरियाँ बराबरी से बॅंटी हों।

3. “तुम भी मेरी बेटी हो”

ये बात कुछ लोगों को शॉकिंग लग सकती है, लेकिन सच्चाई यही है कि सास वास्तव में अपनी बहुओं को “प्रतिद्वंद्वियों” के रूप में देखती हैं क्योंकि इस रिश्ते के सेंटर में एक पुरुष है। क्या एक माँ अपनी बेटी के साथ, अपने बेटे का ध्यान खींचनें के लिए प्रतिस्पर्धा(competition) कर सकती है? जब तक कोई सास बहू को रिश्ते में स्पेस नहीं दे सकती, जब तक सास अपने घर में बेटे और बहू को समान रूप से कंधे से कंधा मिलाकर चलते नहीं देख सकती है, और जब तक वो अपनी बहू को उतनी ही स्वतंत्रता नहीं देती है, जितनी वह अपने बेटे को देती है, तब तक सास माँ नहीं बन सकती।

सबसे अच्छा होगा अगर आप और मैं दोस्त या कमपैनियन बन सकें। हम एक ऐसा सिस्टरहूड फॉर्म करें, जो आपसी विश्वास और समर्थन में स्थापित हो। हम ऐसे दोस्त हो सकते हैं जो आपसी विवादों को दूर करने और एक-दूसरे के जीवन को आसान बनाने की कोशिश करते हैं। बस यही बात एक बहू को अपनी सास से चाहिए, इससे ज्यादा नहीं, इससे कम नहीं।

4. “ये तो मैं प्यार से करती हूँ”

प्रेम और बलिदान दो ऐसे शब्द हैं, जिनका इस्तेमाल करके कोई इंसान मर्डर करके भी बच सकता है। हमारे समाज में महिलाएं अपने परिवार की देखभाल करना और उनके लिए काम करना, अपना धर्म समझती हैं। अपने परिवार को खुश रखने में ही महिलाएँ अपनी खुशी तलाशती हैं इसलिए कभी अपने बेटे को एक ग्लास पानी भी ख़ुद से नहीं उठाने देतीं।

आप भले ही इसे प्यार का नाम देती हों मम्मी जी लेकिन सच तो ये है कि आप परिवार में अपनी एहमियत बनाये रखने के लिए हर सदस्य को ख़ुद पर निर्भर करना चाहती हैं। आपको कोई हॉबी क्लास जॉइन करनी चाहिए, नए दोस्त बनाने चाहिए या अपने शौक पूरे करने चाहिए। परिवार आपसे आज भी प्यार करता है और हमेशा करेगा, आप बस ख़ुद को एहमियत देना सीखिये।

5. “तुम मुझसे ज़्यादा लकी हो”

हाँ, ये सच है। इस बात से कोई इनकार नहीं है कि मेरी पीढ़ी की महिलाएं आपकी जनरेशन की तुलना में ज़्यादा भाग्यशाली हैं, खासकर घरेलू फ्रंट पर। हम ऐसे पुरुषों से शादी करते हैं जो कम से कम शादी में समानता के विचार को जगह तो देते हैं। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारी सासें आपकी सास से बेहतर और ज़्यादा सपोर्टिव हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हमारे पास सब कुछ है। शादी हमारे समाज में ‘समानता’ से अब भी बहुत दूर हैं। घरेलू कामों का डिवीज़न हो, बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी हो, इकोनॉमिक फ्रीडम हो या ज़रूरी निर्णय लेने में एजेंसी; महिलाएँ अब भी बहुत पीछे हैं।

इसलिए हमें इतने में संतुष्ट होकर बैठने के बजाय अपनी आने वाली पीढ़ी की ज़िंदगी बेहतर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

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