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Kirron Kher Supportive Mom Roles: ये है किरण खेर की 5 बैस्ट सुपर मॉम रोल वाली फिल्में

Published by
Yasmin Ansari

माँ हमारे लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट पर्सन होती है ,जिसके बिना हम खुदको अधूरा समझते है। बॉलीवुड की फिल्मों में हमे माँ के हर रंग देखने को मिलते है ,कभी गुस्सा करने वाली माँ। कभी प्यारी माँ तो कभी लाचार माँ। इस माँ कल्चर के रोल में किरण खेर का नाम सबसे ऊपर आता है। किरण खेर ने अपने करियर में कई ऐसी बेहतरीन फिल्मे की है जिसमे उनके माँ के रोल ने दर्शको का दिल जीता है। आइये डालते है किरण खेर बैस्ट सुपर मॉम रोल पर एक नज़र।

5 किरण खेर बैस्ट सुपर मॉम रोल:

देवदास (2002)

संजय भंसाली की फिल्म शरत चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित 1917 के एक नॉवल पर बनी है। इस फिल्म में किरण खेर पारो (ऐश्वर्या राय बच्चन) की एक प्यारी माँ (सुमित्रा चक्रवर्ती) की भूमिका निभाती हैं, जो अपने बचपन के दोस्त देवदास (शाहरुख खान) की वापसी का इंतजार कर रही है। फिल्म में किरण के इस सपोर्टिव रोल को खूब सराहना मिली थी। खेर ने चौथे IIFA अवार्ड्स में देवदास फिल्म के लिए Best Supporting Actress का अवार्ड जीता था।

दोस्ताना (2008)

तरुण मनसुखानी द्वारा डायरेक्ट की गयी यह रोमांटिक कॉमेडी फिल्म हमें दो पुरुषों की मजेदार कहानी बताती है जो एक अपार्टमेंट में किराए पर रहने के लिए गे होने का नाटक करते हैं। किरण खेर ने एक माँ की भूमिका निभाई है जो उस समय गुस्सा हो जाती है जब उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसका बेटा गे है। एक चिढ़चिढ़ी और गुस्से से भरी माँ के इस रोल ने दर्शको को खूब हसाया था।

रंग दे बसंती (2006)

डीजे (आमिर खान) की मां मित्रो सिंह के रूप में किरण के रोल ने पॉप कल्चर में एक आइकोनिक स्टेटस हासिल किया है। न केवल उनके बेटे बल्कि उनके दोस्तों को भी पंजाबी में डांटने का उनका मातृ अधिकार, लोगों को ‘एक और’ घी से लदी रोटी खिलाने की उनकी जिद और युवाओं की दुनिया को बदलने की क्षमता में उनके भरोसे ने दर्शको का दिल जीता है।

ओम शांति ओम (2007)

फिल्म में ओम (शाहरुख खान) ने किरण को “फिल्मी माँ” कहा था ,जो नाम उन पर बिल्कुल सटीक बैठता है। बेला के रूप में, किरण ने एक टिपिकल ओवरप्रोटेक्टिव माँ का रोल निभाया था ,जो हमे अपनी माँ की याद दिलाता है।

ख़ूबसूरत (2014)

उनकी बेटी मिली (सोनम कपूर) के लिए वह मंजू थीं। मां नहीं, सिर्फ मंजू। शायद दुनिया की इकलौती माँ जो नाम से पुकारने की हिम्मत करती। यह केवल उचित था, क्योंकि मिली के जीवन में हर चीज के प्रति उसके खुश-भाग्यशाली दृष्टिकोण, उसकी नौकरी से लेकर उसके प्रेम जीवन तक, ने उसे एक ऐसा दर्जा दिया जो ‘माँ’ से ज्यादा ‘दोस्त’ था।

 

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