लॉयर-एक्टिविस्ट सुधा भारद्वाज की बेटी ने अपनी मां के लिए अंतरिम चिकित्सा जमानत के लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की। बॉम्बे हाईकोर्ट ने तब महाराष्ट्र के जेल अधिकारियों से कहा कि वे 17 मई तक एक्टिविस्ट की हेल्थ सिचुएशन पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

रिपोर्ट्स के अनुसार बेटी मायासिंह द्वारा दायर याचिका के अनुसार, भारद्वाज फ़िलहाल 50 अन्य महिलाओं के साथ जेल वार्ड में बंद हैं। उनके वकील ने एक महामारी के दौरान बाइकुला महिला जेल की “असमान” स्थिति के बारे में चिंता जताई। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि भारद्वाज कोमॉर्बिडिटीज से पीड़ित हैं।

पुणे पुलिस ने जानी-मानी मानवाधिकार वकील सुधा भारद्वाज को 31 दिसंबर, 2018 के भीमा कोरेगांव मामले के सिलसिले में फरीदाबाद के उनके सेक्टर 39 स्थित घर से 31 दिसंबर को गिरफ्तार किया था। उन्हें सूरजखंड पुलिस थाने ले जाया गया था। उसका लैपटॉप और कई दस्तावेज जब्त किए गए। हालांकि, उसका ट्रांजिट रिमांड 30 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया है। उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए, 505, 117 और 120 के तहत और अनलवफुल एक्टिविटीज़ (रोकथाम) एक्ट की कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं।

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वह कौन है?

सुधा भारद्वाज एक भारतीय ट्रेड यूनियन और लैंड अक्वीजिशन के खिलाफ सिविल राइट्स एक्टिविस्ट हैं। वह एक वकील भी हैं जो 29 वर्षों से छत्तीसगढ़ राज्य में काम कर रही हैं और रह रही हैं।

उनके अस्सोसिएशन्स

वह छत्तीसगढ़ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की सेक्रेटरी हैं। वह जनहित (एक वकील सामूहिक) की संस्थापक भी हैं और दिवंगत शंकर गुहा नियोगी के छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से भी जुड़े हुए हैं।

भारत में जन्म और वापसी

भारद्वाज का जन्म यूनिटेड स्टेट्स अमेरिका में कृष्ण और रंगनाथ भारद्वाज के घर हुआ था। वह 11 साल की उम्र में भारत लौट आई और 18 साल की उम्र में अपनी अमेरिकी सिटीजनशिप छोड़ दी।

शिक्षा

उन्होंने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (IIT), कानपुर में एडमिशन लिया और 1984 में पाँच साल बाद वहाँ से ग्रेजुएट की उपाधि प्राप्त की। बाद में, साल 2000 में, उन्होंने रायपुर के पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से एफिलिएटेड कॉलेज से लॉ की डिग्री भी प्राप्त की।

वर्क

ग्रेजुएशन होने के बाद, उन्होंने प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों द्वारा किए गए लैंड एस्क्वीजिशन्स से प्रभावित लोगों के लिए काम करना शुरू कर दिया। वह आईआईटी में एक छात्र के रूप में अपने समय के दौरान उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में मजदूरों की भयानक कार्य स्थितियों से अवगत हुई। इसके बाद वे 1986 में नियोगी के छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के साथ काम करने के लिए चली गई।

वह छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से भी निकटता से जुड़ी रही हैं। उन्होंने करप्ट बोरोक्रेट्स के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी और यह सुनिश्चित किया कि भिलाई में स्थित माइन्स और प्लांट्स में श्रमिकों को उचित मजदूरी मिले।

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