ओडिशा की सबसे प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता शांति देवी को 72 वें गणतंत्र दिवस पर पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। “मैं सरकार की  शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना। लेकिन, मुझे लगता है कि किसी भी इंसान के लिए असली पुरस्कार समाज की भलाई के लिए उसका काम है। अगर कोई किसी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है, तो इससे बड़ा कोई पुरस्कार नहीं हो सकता है।”

86 वर्षीय ने आदिवासी महिलाओं और बच्चों के लिए काम करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। वह उन छह पद्म श्री अवार्डी में से एक थीं जिन्हें इस वर्ष पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

आइए हम इस सशक्त महिला को बेहतर तरीके से जाने।

शुरूआती जीवन

शांति देवी का जन्म 18 अप्रैल, 1934 को बालासोर में एक जमींदार परिवार में हुआ था। एक डॉक्टर से शादी करने के बाद, उन्होंने कोरापुट जिला, आदिवासी जिले को अपना घर बनाया। यहाँ उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की, जहाँ विभिन्न बीमारियों से पीड़ित लोगों की देखभाल की जाती थी। वह पहले डायरेक्टर ऑफ़ एजुकेशन भी रह चुकी हैं जो ओडिया संस्कृति के प्रचार में भी सक्रिय रही हैं।

मैं सरकार की  शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना। लेकिन, मुझे लगता है कि किसी भी इंसान के लिए असली पुरस्कार समाज की भलाई के लिए उसका काम है। अगर कोई किसी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है, तो इससे बड़ा कोई पुरस्कार नहीं हो सकता है।”

शांति देवी का काम

शांति देवी विनोबा भावे के काम से प्रेरित थीं। युवावस्था में, देवी भावे के भूदान आंदोलन में भी शामिल हो गई थीं। देवी ने 1965 में सेवा समाज नामक एक वोलंटरी बॉडी की स्थापना की जो अनाथ बच्चों को शिक्षा और बेसिक ज़रूरते प्रदान करने की दिशा में काम कर रहा है। इन बच्चों को वोकेशनल ट्रेनिंग भी प्रदान की गयी है। शांति देवी ने उस के लिए भी एक आश्रम बनवाया था।

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