“माँ का तो काम ही होता है त्याग करना अपने बच्चों के लिए”। जब हम motherhood के बारे में सोचते है तो सबसे पहला शब्द हमारे दिमाग में क्या आता है? ज़िम्मेदारी? त्याग! जब हम भारत में motherhood के बारें में बात करते है तो जो सबसे पहला शब्द ज्यादार लोगों के दिमाग में आता है ,वो है “त्याग”। Motherhood struggle 

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हर औरत से ये एक्सपेक्ट किया जाता है कि माँ बनने के बाद वह अपना सारा समय अपने बच्चों की परवरिश में लगा देगी। तो क्या इसका मतलब ये हुआ के एक औरत को माँ बनने के बाद अपने बारें में सोचने का कोई हक़ नहीं हैं?

क्या अगर एक औरत बच्चे होने के बाद भी खुदको या अपनी फाइनैन्शियल सिक्योरिटी को पहले रखती है तो वो गलत है?

बचपन से हम हिंदी फिल्मों में देखते आ रहे है कि माँ अपने बच्चों को पेट काट – काट के बड़ा करती है। मदर इंडिया में हमने देखा कि कैसे माँ हल जोत के अपने बच्चों को पालती है। इन सब चीज़ो के कारण एक धारणा बन चुकी है कि माँ का तो काम ही होता है त्याग करना अपने बच्चों के लिए। अगर वो कुछ काम भी करेगी तो अपनी बच्चों की परवरिश अच्छी करने के लिए काम करेगी ,खुदकी सेटिस्फैक्शन के लिए नहीं।

क्यों हम सिर्फ़ माँ से त्याग करने की उम्मीद करते है?

क्यों हमेशा माँ अपनी इक्छाओं में कटौती करे और अगर वो नहीं करती है तो उसका नेगेटिव इफ़ेक्ट उनके बच्चों पर पड़ेगा। अगर किसी का बच्चा पढ़ने में अच्छा नहीं है तो देखा जाता है की माँ कहा परवरिश में कमी छोड़ रही है। अगर माँ काम पर जाये तो लोग बोलते है “अरे इसकी माँ तो काम पर जाती है ,ज़रूर इसके खाने-पीने पर ध्यान नहीं देती होगी” क्या ये बाते सही है?

बच्चों को बड़ा करना सिर्फ़ माँ का कर्तव्य नहीं होता

बच्चों की परवरिश, उनके पिता ,उनके परिवार और समाज की भी बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। किसी भी इंसान से ये उम्मीद करना के वह अपनी ज़िन्दगी का पूरा समय सिर्फ़ एक एक्टिविटी पर लगा दे ,ये उनके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी है। अगर कोई माँ अपने लिए थोड़ा टाइम निकालती है तो वो गलत नहीं है।उन्हें भी खुद की ख़ुशी के लिए कुछ करने दे ,अगर वो खुश रहेगी तो अपने बच्चे और परिवार को भी खुश रखेगी। Motherhood struggle 

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