एक रियलिटी शो में कपल से पूछा जाता है कि आप दोनों में से बच्चों के डाइपर कौन चेंज करता था। औरत जवाब देती है कि मैं बाहर रहती थी तो ज़्यादातर ये ही करते थे। इस पर ऐंकर, हसबैंड को मज़ाकिया अंदाज़ में घूर कर देखता है और ऑडिएंस से ठहाकों की गूँज सुनाई देती है। ये मूमेंट देख कर मेरे परिवार के लोग भी हँसने लगे और मैं ये समझ नहीं पा रही थी कि इसमें हँसने वाली कौन सी बात है।

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मेरे मन में प्रश्न था कि अगर जवाब इसका उल्टा होता, क्या तब भी ये लोग ऐसे ही हँस रहे होते। ‘नहीं’, तब कोई नहीं हँसता, तब किसी की आँखें बड़ी नहीं होतीं क्योंकि अगर औरत बच्चों के डाइपर चेंज करे तो ये उसका काम हो जाता है। जो काम औरत सदियों से करती आई है, भला उसे क्यों प्रश्न किया जाएगा। अजूबा तो ये है कि आज कुछ “मर्द औरत का काम कर रहे हैं” और इसलिए हँसी का पात्र भी ये मर्द ही हैं।

ऐंकर का ये प्रश्न पूछना ही उसकी सेक्सिस्ट सोच को दर्शाता है। ये सोच समाज ने गढ़ी है और इसे मीडिया ने समय के साथ बढ़ावा दिया है। आज आप विज्ञापनों में देखेंगे कि एक औरत ही टॉयलेट क्लीनिंग प्रोडक्ट्स से लेकर हेल्थ प्रोडक्ट्स तक का ऐड करती है। इन विज्ञापनों में दिखाया जाता है कि कैसे एक माँ सब कुछ कर सकती है और पिता केवल ऑफिस का काम करने तक सीमित रहता है। ‘माँ’ के कैपिटलाइजेशन ने पिता को बच्चों की ज़िम्मेदारी से और अलग कर कर दिया है।

बच्चों की ज़िम्मेदारी माँ की और हक पिता का। क्यों?

जब विराट कोहली ने पैटरनिटी लीव लेने की बात कही तो कई लोगों ने उनकी आलोचना शुरू कर दी और उन्हें उनकी “नेशनल ड्यूटी” याद दिलाने लगे। इससे फ़िर एक बात सामने आई कि पिता को बच्चों की ज़िम्मेदारी से किस प्रकार दूर किया जाता है। बच्चों के पैदा होने और उनके पालन पोषण में पिता के योगदान को कैसे डिसकरेज किया जाता है, ये उसी का एक उदाहरण है।

सोसाइटी ने तो पहले से ही ये तय कर रखा है कि बच्चों को संभालना औरत की ही ज़िम्मेदारी है। तभी तो हाइली ऐंबीशियस लड़की भी बच्चा हो जाने के बाद अपनी जॉब छोड़ने को तैयार हो जाती है। कमाल की बात तो ये है कि बच्चों को जन्म देने और पालने की ज़िम्मेदारी तो माँ की होती है परंतु उन पर अधिकार पिता का हो जाता है। बच्चों की ज़िंदगी से जुड़े सभी फै़सले अक्सर पिता ही लेते हैं। आपने ये भी देखा होगा कि किस प्रकार बच्चों के सफल होने पर पिता की पीठ थप थपाई जाती है और उनसे गलती हो जाने पर माँ पर तंज कसे जाते हैं।

जब भी बच्चों की परवरिश पर सवाल उठाए जाते हैं, माँ को ही कटघेरे में खड़ा किया जाता है। हमेशा एक ही सवाल उठता है, “तुम्हारी माँ ने कुछ नहीं सिखाया?” ये सवाल स्कूल के टीचर्स से लेकर सास-ससुर तक हर कोई पूछता है। बच्चों के प्रति जवाबदेयी पिता की क्यों नहीं होती? उनसे कोई यही सवाल क्यों नहीं पूछता? क्या पिता का रोल केवल डाँटने और पैसे कमाने तक सीमित है? क्या पिता को बच्चों से केवल सरनेम के माध्यम से जुड़ा होना चाहिए?

क्या पितृसत्ता की है गलती ?

पितृसत्ता ने लोगों के दिमाग़ में ये बैठा दिया है कि बच्चे के बुरे कामों का दोष माँ को और अच्छे कामों की सराहना पिता को देनी होती है और बच्चों कि परवरिश केवल माँ ही कर सकती है। अगर कोई पुरुष अपने बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाना चाहे तो उसका मज़ाक उड़ाया जाता है। दूसरों की तो बात छोड़िये, अपने घर के लोग ही इस बात पर मज़ाक उड़ाने लगते हैं। यहाँ तक कि बच्चों के प्रति स्नेह रखने और उनसे प्यार से पेश आने का काम भी माँ का है, पिता तो हमेशा बच्चों के प्रति कठोर होकर रहता है।

पुरुषों को ये सोच बदलनी चाहिए।

बहुत कम ऐसे पुरुष हैं जो आगे आकर बच्चों की परवरिश में अपना योगदान देते हैं। ज़्यादातर लोगों का ये मानना है कि औरत जन्म देती है तो औरत ही पाले। कई लोग तो ये लॉजिक देते हैं कि ये सब काम पुरुषों के लिए बने ही नहीं हैं, ये तो भगवान ने ही औरत की झोली में डाल के भेजा है। पर ज़रा ख़ुद सोचिये अगर बच्चों को पालना पुरुष के बस की बात न होती तो सिंगल फादर्स के बच्चे तो कभी बढ़ते ही नहीं। ये सोच बिल्कुल बेतुकी है। बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाने में भला यूटरस का क्या काम है। ये तो बस एक कला है। माँ भी बच्चों के पैदा हो जाने के बाद उसकी ज़िम्मेदारी लेना सीखती है, फ़िर पिता ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

पुरुषों को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास करना चाहिए। उन्हें भी गलती करने पर बच्चों को समझाना चाहिए और उन्हें लाड करना चाहिए। पिता को कठोर बन कर रहने की ज़रूरत नहीं है। अगर पुरुष अपनी इस सोच से मुक्त होंगे तो बच्चे उनके और करीब आएँगे। आज जो पिता और बच्चों के बीच में एक दीवार बनी हुई है, उसे गिराने का ये सबसे अच्छा तरीका है। समाज और परिवार को इस विषय में सपोर्टिव होने की ज़रूरत है। इससे ज़िम्मेदारियाँ तो आधी-आधी बटेंगी ही, लैंगिक समानता भी आएगी।

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