बचपन में मैंने अपनी माँ को बहुत बार देखा था दर्द से गुज़रते हुए किसी चीज़ को छुपाकर बाथरूम में ले जाते और जब दबे पाओं छुप-छुपाकर कचरा फेंकने जाती तो मेरे मन में हज़ारो सवाल उठते।  एक बार जब मैंने माँ से पूछा की वो क्या छुपा रही हैं तो उन्होंने जवाब दिया की तुम अभी बहुत छोटी हो बड़ी हो जाओगी तब बताउंगी पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा क्योंकि मुझे मेरे सवाल का जवाब नहीं मिला।

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मै चुप रही पर सब देखती रही एक दिन मेरे पेट में बहुत तेज़ दर्द उठा ऐसा दर्द मानो पता नहीं क्या हो रहा हो माँ ने सब कुछ किया अजवाइन का पानी, गर्म पानी का सेक और तो और सारे काढ़े दिए पर मेरी तबियत वैसी की वैसी और फिर मेरी दादी ने कहा कही इसे वो तो नहीं होनेवाला इसकी उम्र बढ़ रही है ये लड़की है कहीं इसे लड़कियों वाली बीमारी तो नहीं हुई।  मैं बहुत घबरा गई , लड़कियों वाली बीमारी, यह क्या होती है और क्या हुआ है मुझे ? ऐसे कितने ही ढेरो सवाल मेरे मन में कैद मुझे बेचैन कर गए।

जैसे -जैसे समय बीता वैसे -वैसे मुझे एहसास हुआ की इसमें किसी की कोई गलती नहीं है और न ये बीमारी है यह कुदरत का ही एक अजूबा है जिससे हर महिला को गुज़ारना पड़ता है।

अगले दिन सुबह जब मै सोकर उठी तो मुझे कुछ अजीब सा महसूस हुआ पूरा बदन दर्द कर रहा था और कपड़ों पर खून था मैं बहुत डर गई और सीधा माँ के पास गई तब माँ ने मुझे बताया डरो नहीं तुम्हे लड़कियों वाली बीमारी हुई है। यह हर महीने होगी और फिर उन्होंने मुझे सेनेटरी पैड दिखाया और उसका इस्तेमाल बताया।  यहाँ तक तो ठीक था समय लगा समझने में की ये है क्या और ये मुझे क्यों हो रहा है पर फिर धीरे -धीरे शुरू हुई इसके साथ की रोक-टोक।

माँ अक्सर कहती है इन दिनों में मंदिर नहीं जाते, रसोई में भी नहीं जाते किसी भी पवित्र चीज़ को हाथ नहीं लगाते। पैड को छुपाकर ले जाया करो और तब मै समझी माँ क्यों ऐसा करती थी. ज़्यादा उछल-कूद मत करो, खट्टा या ठंडा मत खाओ और एक ही जगह बैठी रहो।

मुझे समझ ही नहीं आता था की यह बिमारी है या किसी गलती की पनिशमेंट।  यह बीमारी है जो हर लड़की को होती है और  इसमें इतनी रोक-टोक और इतना अजीब व्यवहार हमारे साथ क्यों ?

जैसे -जैसे समय बीता वैसे -वैसे मुझे एहसास हुआ कि इसमें किसी की कोई गलती नहीं है और न ये बिमारी है यह कुदरत का ही एक अजूबा है जिससे हर महिला को गुज़ारना पड़ता है।  इसमें समाज का व्यवहार जो महिलाओं के साथ है वो कितना गलत और इर्रेलेवेंट है। आजकल के समय में भी अगर हम इस मुद्दे की नाज़ुकता को ना समझकर बस अपनी रूढ़ियाँ महिलाओं पर थोपते रहेंगे तो कैसा हमारा देश और समाज तरक्की करेगा ।

वही औरत जिसे दुनिया की जननी कहा जाता है, उसी के साथ ये गलत व्यवहार किया जाता है। कोई क्यों नहीं सोचता यह की एक महिला इस सब से क्यों गुज़रती है , वो क्या -क्या सहन करती है और हद तो तब हो जाती है जब इस सब के साथ- साथ उसे यह मानसिक शोषण भी सहना पड़ता है।  अब समय आ गया है कि समाज समझे कि पीरियड्स बीमारी नहीं बल्कि कुदरत की एक बायोलॉजिकल प्रोसेस है

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