महिलाओं के लिए शादी बना ज़िंदगी का मेन मकसद, जानिए ऐसा क्यों ?

महिलाओं के लिए शादी बना ज़िंदगी का मेन मकसद, जानिए ऐसा क्यों ? महिलाओं के लिए शादी बना ज़िंदगी का मेन मकसद, जानिए ऐसा क्यों ?

SheThePeople Team

05 Aug 2021


महिलाओं के लिए शादी बना ज़िंदगी का मेन मकसद – हमारे देश में लड़की के जन्म से ही समाज और घर परिवार शादी की बातें करने लगता है। एक ओर लड़कियों के मा‌ बाप अच्छी शादी करवाने की चिंता करने लगते हैं तो दूसरी ओर लडकियाँ शादी को अपनी ज़िंदगी का एक मात्र मकसद बना लेती हैं। महिलाओं को चाहिए कि एक बार वो शादी के दायरे से बाहर निकल कर दुनिया देखें, शायद ज़िंदगी का नया मकसद मिल जाए।

बचपन से ही कराया जाता है तैयार

गुड्डे-गुड़िया के खेल से लेकर रसोईघर में हाथ बँटाने तक महिलओ को बचपन से शादी के लिये तैयार करना शुरु किया जाता है।उन्हें छूटपन से ही इसी सोच के साथ पलना पड़ता है। ऐसे मे अगर महिलओ ने खुद ही अपनी ज़िंदगी को शादी की पतंग से बाँध रखा हो तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी। 

लड़कियाँ हैं पराया धन  

भारतीय परंपरा में महिलाओं को पराया धन मानने का कान्सेप्ट बहुत पुराना है। टीनएज आते आते घर की महिलाये लड़कियों को मानसिक रूप से तैयार करती हैं कि शादी के बाद ससुराल ही उनका असली घर है।इस तरह के माहौल में ढलने के लिए लड़किया शादी को अपने ज़िन्दगी का मकसद बना बैठती हैं। महिलाये अपने अस्तितव की तलाश में शादी को जरुरी समझती है। 'बेटियां तो पराया धन है' - समाज की यही सोच हमारे देश की महिलाओ को आगे नहीं बढ़ने देती।शादी बना ज़िंदगी का मेन मकसद

पढ़ाई बन रही शादी की एलेजिबिलिटी और शादी बना ज़िंदगी का मेन मकसद

‘अच्छे घर में शादी करनी है तो डिग्री होनी चाहिये’। पढ़ाई को लेकर महिलाओं में ये धारणा बहुत ते़जी से फैल रही है। एक पढ़ी लिखी बहु बनने की इस दौड़ में महिलाये पढ़ाई के असली मायने भुल चुकी हैं।उनके लिये शादी बना ज़िंदगी का मेन मकसद और पढ़ना लिखना अपने  शादी के मकसद को पूरा करने की एक सीढी बन कर रह गया है।

समाज ही नहीँ महिलाये खुद भी हैं ज़िम्मेदार

हम पूरा दोष समाज और उसकी सोच का नहीं बता सकते क्योकि महिलाये भी इसमें बराबर की ज़िम्मेदार हैं। अपनी पहचान और सपनो के लिए जब तक वे खुद आगे नहीं आएँगी तब तक ये सिलसिला चलता रहेगा। कहीं न कहीं महिलाओं की शादी को लेकर चुप्पी ही समाज की इस सोच को बढ़ावा देने में ज़िम्मेदार है।यदि अपने अधिकारों के लिये खुद सामने नहीं आये तो इसी तरह महिलाओं को कदम कदम पर patriarchy से  दबना पड़ेगा।शादी के लिये हामी भर देना और उसे अपनी ज़िंदगी का मकसद बना लेना सही नहीं है।

खुद को करना होगा आज़ाद

महिलाओं को खुद आगे बढ़ना होगा। अपनी ज़िंदगी के नये लक्ष्य बनाने होंगे और महिलाओं का सब से जरुरी है ये जानना कि शादी ही सब कुछ नहीं बल्कि उसके अलावा दुनिया में बहुत कुछ है करने के लिये। महिलाओं को ये समझना होगा कि ये दुनिया बहुत बड़ी है जिस में कई सपने है जो उनकी नई उम्मीद और एक नया मकसद बन सकती है।





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