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Via (Youtube)
फ़िल्मकार रहत शाह काज़मी ने अपनी फ़िल्म लव इन वियतनाम के ज़रिए साबाहत्तीन अली के 1943 के मशहूर उपन्यास मैडोना इन अ फर कोट को भारत-वियतनाम की रोमांटिक कहानी में ढाला है।
लव इन वियतनाम: एक 1940 के दशक की साहित्यिक कृति पर आधारित अनोखी प्रेम कहानी
एक अलग तरह की प्रेम कहानी
एक पंजाबी लड़के और वियतनामी लड़की की प्रेम कहानी सुनने में जितनी अलग लगती है, उतनी ही ख़ूबसूरत है। यह फ़िल्म आम बॉय-मीट्स-गर्ल वाले फ़ॉर्मूले से हटकर है। यह प्यार, इंतज़ार और ईमानदारी पर एक नर्म और गहरी कहानी है।
फ़िल्म को वियतनाम और भारत, दोनों जगहों पर शूट किया गया है। ये लोकेशन सिर्फ़ खूबसूरत नज़ारे नहीं, बल्कि कहानी का अहम हिस्सा हैं।
शानदार कलाकार
फ़िल्म में शांतनु महेश्वरी, अवनीत कौर, खा न्गान, फ़रीदा जलाल और राज बब्बर जैसे कलाकार हैं। इसे कृतिका रामपाल ने को-राइट किया है।
रिलीज़ के बाद से ही फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी सराहना मिली है। सियोल ग्लोबल मूवी अवार्ड्स 2025 में इसे बेस्ट एशियन फ़िल्म का अवार्ड मिला, और रहत को बेस्ट डायरेक्टर ऑफ़ एशिया का ख़िताब मिला।
"They just started bashing me left, right and centre…” Actor Shantanu Maheshwari shared some of his unpleasant audition experiences. He was at the #Cannes 2024 yo unveil the poster of his new film, Love in Vietnam. Brut is the official media partner for #Cannes2024pic.twitter.com/sOogTWGguH
— Brut India (@BrutIndia) May 26, 2024
रहत शाह काज़मी से बातचीत
ShethePeople ने रहत से फ़िल्म की कहानी, उसके विषय और दो अलग संस्कृतियों को पर्दे पर लाने के अनुभव के बारे में बात की।
इस उपन्यास को फ़िल्म बनाने की प्रेरणा कैसे मिली?
रहत बताते हैं, "मैडोना इन अ फर कोट दुनियाभर में आज भी बेहद पसंद किया जाने वाला क्लासिक उपन्यास है। मुझे यह पसंद आया कि यह कहानी आज भी कितनी प्रासंगिक है।
इसके केंद्र में प्यार है, और प्यार तो हर देश, हर भाषा, हर संस्कृति में एक जैसा होता है। प्यार सीमाएं नहीं समझता।
जब मेरी को-राइटर कृतिका रामपाल ने मुझे इस उपन्यास के बारे में बताया, तो मैं तुरंत आकर्षित हो गया। मैं पहले से ही वियतनाम में एक फ़िल्म बनाने की योजना बना रहा था, तो सब कुछ एकदम सही जगह पर बैठ गया।"
पुराने उपन्यास को आधुनिक दर्शकों के लिए कैसे तैयार किया?
"इस उपन्यास की भावनात्मक गहराई कालजयी है। यह किसी एक दौर या जगह की कहानी नहीं है। यह प्यार और इंतज़ार की एक सार्वभौमिक कहानी है।
हमने किरदारों को दो अलग संस्कृतियों में रखा, लेकिन कहानी की आत्मा वही रही। हमने पंजाब की सुंदरता और वहां के रिश्तों को दिखाया।
कहानी एक पंजाबी लड़के की है जिसकी बचपन की दोस्त से लगभग सगाई हो चुकी है। वो लड़की उससे बेहद प्यार करती है, लेकिन वो अपने मन के बारे में पक्का नहीं है।
जब वो वियतनाम जाता है, तो उसे एक पेंटिंग से प्यार हो जाता है, और फिर उस पेंटिंग वाली लड़की से असली ज़िंदगी में मिलता है। यहीं से असली भावनात्मक द्वंद्व शुरू होता है।"
दोनों संस्कृतियों को बिना रूढ़िवादिता के कैसे दर्शाया?
"यह सबसे बड़ी चुनौती थी। मैं भारतीय हूं, तो पंजाबी संस्कृति मेरे लिए स्वाभाविक थी।
वियतनाम के लिए हमने वियतनामी स्क्रिप्ट डॉक्टर्स के साथ काम किया। मैंने वियतनाम की कई बार यात्रा की, वहां के लोगों के साथ समय बिताया, उनकी जीवनशैली को समझने की कोशिश की।
हमारा उद्देश्य हमेशा रूढ़िवादिता से दूर रहकर एक वास्तविक कहानी बताना था। जब फ़िल्म डा नांग में रिलीज़ हुई, तो दर्शक बहुत भावुक हो गए। कोरिया और वियतनाम में भी यही प्रतिक्रिया मिली।"
इस फ़िल्म ने रोमांस और सिनेमा के बारे में आपकी सोच कैसे बदली?
"हर फ़िल्म एक सीखने की प्रक्रिया है। जब आप ख़ुशी के दृश्य लिखते हैं, तो वो ख़ुशी आप भी महसूस करते हैं। जब अलगाव या त्याग के दृश्य लिखते हैं, तो वो भावनाएं आपके साथ रह जाती हैं।
लव इन वियतनाम बहुत कोमल, सूक्ष्म और गहरी भावनात्मक फ़िल्म है। वियतनाम में कई लोगों ने इसे 'असंभव प्रेम कहानी' कहा। इस नज़रिए ने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि रोमांस को पर्दे पर और शांत, दिल को छूने वाले तरीके से कैसे दिखाया जा सकता है।"
फ़िल्म में ख़ामोशी और ठहराव की क्या भूमिका है?
"ख़ामोशी इस फ़िल्म में बहुत अहम है। मेरा मानना है कि भावनाएं अक्सर संवादों के बीच में होती हैं, सिर्फ़ संवाद में नहीं।
एक दृश्य को बोलने वाला नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया देने वाला व्यक्ति आकार देता है। ख़ामोशी भावनाओं को जगह देती है और दर्शकों को किरदारों की आंतरिक दुनिया से जुड़ने का मौका देती है।
अगर हर समय सब कुछ शोरगुल भरा हो, तो थकान होती है। ख़ामोशी दर्शकों को सांस लेने की जगह देती है।"
भारतीय सिनेमा को वैश्विक स्तर पर और मज़बूत बनाने के लिए कैसी कहानियां बतानी चाहिए?
"भारत संस्कृति, भाषाओं, इतिहास और पौराणिक कथाओं के मामले में अविश्वसनीय रूप से समृद्ध देश है। हमारे पास कहानियों का अंतहीन ख़ज़ाना है।
मुझे लगता है कि भारतीय सिनेमा को हॉलीवुड की नकल करने की बजाय अपनी संस्कृति की जड़ों वाली कहानियां बतानी चाहिए।
हमने बार-बार देखा है कि गहरी भारतीय कहानियां दुनियाभर में पसंद की जाती हैं। हमें हिंदी, उर्दू और क्षेत्रीय साहित्य से ज़्यादा कहानियां अपनानी चाहिए। कांतारा जैसी फ़िल्में साबित करती हैं कि ऐसी कहानियां कितनी शक्तिशाली हो सकती हैं।
हमारी संस्कृति अभिव्यक्तिपूर्ण, भावनात्मक और जीवंत है। लेकिन मूल रूप से, भारतीय सिनेमा को गर्व से भारतीय कहानियां बतानी चाहिए।"
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