पुराने समय में ये कहा जाता था की मृत्यु के बाद उस मनुष्य की आत्मा को तब तक शांति नहीं मिलेगी जब तक उसके परिवार का कोई पुरुष सदस्य उसकी चिता को मुखाग्नि नहीं देगा। पर महिलाओं के साथ यह नाइंसाफी क्यों न ही उन्हें शमशान घाट पर जाने की इजाज़त होती है और न ही उन्हें अपने माता पिता की चिता को अग्नि देने की इजाज़त होती है। उसके पीछे हर किसी की अपनी अलग विचार धारणा है की ऐसा क्यों होता है ?

महिलाओं को शमशान घाट पर जाने की इजाज़त क्यों नहीं है ?

पुराने समय से यही मान्यता रही है की एक मनुष्य की चिता को अग्नि देने का हक़ हमेशा एक बेटे का होता है और अगर किसी का बेटा न हो तो भी यह हक़ किसी रिश्तेदार के बेटे को दे दिया जाता है पर कभी भी बेटी को यह हक़ नहीं दिया जाता  तो  आइये जानते है इसके पीछे की अलग -अलग धारणाएं:

  1. यह कहा जाता है कि एक बार पुरुष जब चिता को श्मशान घाट छोड़ने के लिए जाते है तो घर को साफ करना होगा। तकनीकी रूप से, महिलाओं को ऐसा करना चाहिए। यही कारण है कि महिलाओं को घर पर रहने के लिए कहा जाता है, लेकिन यह कोई जायज़ कारण नहीं है।
  2. यह भी कहा जाता है की महिलाएं एक नरम दिल की होती है इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि शरीर को जलता देख महिलाएं घबरा सकती हैं, इसलिए उन्हें दूर रखा जाता है।

हालांकि पंडित एक लड़की को उसके माता-पिता का अंतिम संस्कार नहीं करने के लिए हजार अन्य कारण देंगे, अगर हम उन्हें बारीकी से समझे , तो उनमें से कोई भी वास्तव में कोई लॉजिक नहीं देता है और ये सब काल्पनिक हैं। यह एक और कारण है कि आज महिलाएं इन रूढ़ीवादी मान्यताओं पर सवाल उठाना और उन्हें खत्म कर देना सही समझती हैं। हम शिक्षित हैं और सभी के पास  तर्क करने की शक्ति है।

आइये अब जानते है उन महिलाओं को जिन्होंने आगे बढ़कर इस प्रथा को तोडा:

नमिता कौल

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की गोद ली हुई बेटी , नमिता कौल, ने अगस्त 2018 में उनका अंतिम संस्कार किया था। उनके इस काम  ने लैंगिक पक्षपाती समाज को एक मजबूत संदेश दिया और हेडलाइनो में भी जगह बनाई, क्योंकि यह हिंदू धर्म के खिलाफ था। इससे ठीक पहले, राष्ट्र सेविका समिति की बौद्धिक प्रकोष्ठ की संयोजक प्रीति मल्होत्रा ​​ने कहा, “अगर एक महिला अपने परिवार के सदस्यों की चिता को रोशन करती है तो क्या होगा? वह लड़की भी एक सांस लेने वाला शरीर है जो भावनाओं के भवंडर में खड़ी है। ”

पंकजा मुंडे

महाराष्ट्र विधान सभा की सदस्य पंकजा मुंडे ने जून 2014 में अपने पिता गोपीनाथ मुंडे का अंतिम संस्कार किया। अपने कार्य के माध्यम से, उन्होंने जानबूझकर या अनजाने में देश में प्रचलित लिंग असमानता पर पुनर्विचार पर एक बहस शुरू की। वह निश्चित रूप से ऐसा करने वाली पहली महिला नहीं थीं, लेकिन राजनीतिक क्षेत्र का हिस्सा होने के नाते, उन्होंने वास्तव में अपने कार्य के माध्यम से एक संदेश फैलाया।

ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां आम महिलाओं ने भी अपने माता-पिता की चिता को आग दी। ऐसी रिपोर्टें आई हैं, जिनमें से एक भोपाल की है और शहर की पहली मानी जाती है। जब चार बेटियों ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया, तो लोगों की आँखें नम हो गईं। अहमदाबाद में एक और घटना सामने आई, जहां रिश्तेदारों ने नाराजगी व्यक्त की, लेकिन बेटियां अपने फैसले में अडिग थीं।

 

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