72 वर्षीय विधवा सुखमती मानिकपुरी अपनी दो पोतियों – राज लक्ष्मी और श्रीस्ती का पालन -पोषण करने के लिए भीख माँगती है। 16 और 10 साल की उम्र में सुखमती की दोनों पोतियाँ एक सरकारी स्कूल में जाती हैं। बिलासपुर जिले की निवासी, सुखमती, जो अपने द्वारा इकठ्ठा किए गए थोड़े से पैसों के साथ मुश्किल से जीवन जीती है उन्होंने वहां के लोगों और अधिकारियों को अपनी उदारता से प्रभावित किया है। उन्होंने करीब  एक दर्जन चावल, लगभग एक दर्जन साड़ियाँ और कुछ कैश जरूरतमंद लोगों को दान की। सुखमती ने 12 साल पहले अपने पति को खो दिया था और वह तब से भीख माँग रही हैं।

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बिलासपुर जिला छत्तीसगढ़ के पूर्व में लगभग 125 किलोमीटर दूर स्थित है, जहाँ सुखमती भीख माँगकर जीवन जीती हैं। अपनी पोतियों के पालन -पोषण की जिम्मेदारी के बावजूद दान में अपना सामान दिया । “मैं लॉकडाउन में जरूरतमंदों का दर्द देख रही हूं। मैं खुद भीख मांगकर अपना गुजारा करती हूं और जो कुछ भी मैं बिलासपुर नगर निगम के एक नगरसेवक को दे सकती थी उसे दान कर दिया।” सुखमती ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इस मुश्किल समय के दौरान हमें एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए।

बिलासपुर के जिला कलेक्टर डॉ संजय अलंग ने उनके इस काम की सराहना करते हुए कहा, “कई लोगों को घातक COVID-19 के प्रकोप से निपटने के लिए बहुत मुश्किल समय का सामना करना पड़ रहा है, सुखमती का कार्य इंसानियत के नाम पर अच्छाई का प्रतीक है।”

“मैं लॉकडाउन में जरूरतमंदों का दर्द देख रही हूं। मैं खुद भीख मांगकर अपना गुजारा करती हूं और जो कुछ भी मैं बिलासपुर नगर निगम के एक नगरसेवक को दे सकती थी उसे दान कर दिया।” – सुखमती

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उन्होंने  अपना राशन क्यों दान किया?

सुखमती ने एक क्विंटल चावल दान करने के पीछे का कारण बताया जिसने हमारा दिल जीता। “मुझे पता है की भूख का दर्द कैसा होता है। इन जरूरतमंद और असहाय लोगों के लिए जो भी संभव हो सके, उसकी व्यवस्था करने के लिए मैं और भीख माँगने लगी। किसी को भी भूखा नहीं सोना चाहिए।

अपने इस कार्य में, वह अपने क्षेत्र के कॉर्पोरेटर विजय केशरवानी के संपर्क में रही और उन्होंने भीख मांगे हुए चावल और कपड़े दान कर दिए। वह नहीं चाहती कि कोई भी भूखा सोए।

“मैं यह सच में करना चाहती थी।” गरीबी से जूझ रहे जीवन जीने और दो पोतियों की देखभाल करने के दौरान, उसने संकट के दौरान दूसरों की सहायता करने का दृढ़ संकल्प दिखाया। ” वह तीन लोगों के परिवार में एकमात्र कमानेवाली है और ज़्यादातर दिनों में वे अपनी वित्तीय चुनौतियों को दूर करने के लिए संघर्ष करती हैं। केशरवानी ने दोनों लड़कियों के सभी शैक्षिक खर्चे उठाने की ठानी है।

लगभग 12 साल पहले अपने पति को खोने के बाद, सुखमती को जीवित रहने के लिए यह रास्ता अपनाना पड़ा ताकि वह अपना खर्च उठा सके। उसने उन दो लड़कियों की ज़िम्मेदारी संभाली जब कुछ साल पहले उन्होंने अपने पिता को खो दिया था, उनकी माँ ने दोनों को छोड़ दिया और बिलासपुर से दूर किसी से शादी कर ली।

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