“तुम्हें तो पूरी आज़ादी है” तो फैसलों पर आख़िरी मोहर पुरुषों की क्यों होती है?

“तुम्हें तो पूरी आज़ादी है” एक सुनने में अच्छी लाइन हो सकती है, लेकिन सवाल आज भी वही है—क्या उस फ्रीडम के साथ फैसले लेने का पूरा हक़ भी दिया जा रहा है?

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Dimpy Bhatt
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if freedom is equal why do men have the final say

Photograph: (freepik)

आज की महिलाओं से अक्सर कहा जाता है—“अब तो तुम्हें पूरी आज़ादी है।” पढ़ाई, करियर, कपड़े, दोस्त—सब कुछ चुनने की छूट है। बाहर से देखने पर लगता है कि बराबरी मिल चुकी है। लेकिन गहराई से देखें, तो एक सवाल बार-बार सामने आता है, अगर फ्रीडम सच में है, तो लाइफ के बड़े डिसिशन पर आख़िरी मोहर अब भी ज़्यादातर पुरुषों की क्यों होती है? ये पैराडॉक्स (Paradox) आज की सोसाइटी की सबसे चुपचाप चलने वाली रेअलिटीज़ में से एक है।

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“तुम्हें तो पूरी आज़ादी है”—तो फैसलों पर आख़िरी मोहर पुरुषों की क्यों होती है?

फ्रीडम दिखती है, राइट्स  सीमित रहते हैं

महिलाओं को चूस करने की छूट तो दी जाती है, लेकिन एक लिमिट तक। किस सब्जेक्ट में पढ़ना है, किस जॉब को चुनना है—यहाँ तक तो ठीक है। लेकिन शादी कब करनी है, किससे करनी है, करियर कितने साल चलाना है या बच्चे कब प्लान करने हैं—इन फैसलों में अक्सर फॅमिली या पार्टनर की राय “फाइनल” मानी जाती है। महिला की सहमति ज़रूरी तो होती है, लेकिन क्रुशल नहीं।

‘परिवार की भलाई’ का बोझ

कई बार महिलाओं से कहा जाता है कि डिसिशन उनके हित में ही लिए जा रहे हैं। “हम तुम्हारा ही भला सोच रहे हैं,” यह लाइन बहुत आम है। लेकिन इस भलाई की डेफिनेशन ज़्यादातर पैट्रिअरच्य (patriarchy) सोच से तय होती है। महिला से उम्मीद की जाती है कि वो एडजस्ट करे, कोम्प्रोमाईज़ करे और फैमली की शांति के लिए अपने फैसलों को पीछे रख दे।

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फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस के बावजूद कंट्रोल

आज बड़ी संख्या में महिलाएँ कमाती हैं, टैक्स देती हैं और घर के एक्सपेंसेस में बराबर की हिस्सेदार हैं। फिर भी बड़े फाइनेंशियल फैसलों—घर खरीदना, सिटी बदलना, इन्वेस्ट करना—में पुरुषों की बात ज़्यादा वजन रखती है। यह दिखाता है कि इकनोमिक इंडिपेंडेंस (Economic Independence) अपने आप में डिसिशन की ताकत नहीं बन पाती, जब तक सोच नहीं बदलती।

‘तुम कर सकती हो’ बनाम ‘तुम्हें करना चाहिए’

सोसाइटी महिलाओं से कहती है कि वे सब कुछ कर सकती हैं, लेकिन साथ ही यह भी तय कर देता है कि उन्हें क्या करना चाहिए। यह डबल स्टैंडर्ड (Double Standard) महिलाओं को लगातार गिल्ट में रखता है। अगर वे अपनी शर्तों पर फैसला लें, तो उन्हें सेल्फिश कहा जाता है। अगर चुप रहें, तो उन्हें आज़ाद मान लिया जाता है।

बदलाव कहाँ से शुरू होगा

असली फ्रीडम सिर्फ़ चॉइस मिलने से नहीं आती, बल्कि डिसिशन की ताकत मिलने से आती है। जब तक महिलाओं के “ना” और “हाँ” को बराबर महत्व नहीं मिलेगा, तब तक फ्रीडम अधूरी रहेगी। पुरुषों को इस बातचीत में पार्टनर बनना होगा, न कि डिसिशन मेकर (decision-maker)।

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“तुम्हें तो पूरी आज़ादी है” एक सुनने में अच्छी लाइन हो सकती है, लेकिन सवाल आज भी वही है—क्या उस फ्रीडम के साथ फैसले लेने का पूरा हक़ भी दिया जा रहा है? जब तक इसका जवाब नहीं बदलेगा, बराबरी सिर्फ़ शब्दों तक ही सीमित रहेगी।

Patriarchy Independence