Paraya Dhan Concept: क्या बेटी अपने माता पिता की देखभाल नहीं कर सकती?

Paraya Dhan Concept: क्या बेटी अपने माता पिता की देखभाल नहीं कर सकती? Paraya Dhan Concept: क्या बेटी अपने माता पिता की देखभाल नहीं कर सकती?

Monika Pundir

02 Aug 2022

यह भारत में लड़कियों के लिए दोहरी मार है। वे जन्म के दिन से ही 'पराया धन' है जिसे अपने भावी पति के घर का प्रबंधन करने के लिए पाला और प्रशिक्षित किया जाना है। एक बार शादी हो जाने के बाद, वे अपने वैवाहिक घर में भी अंत तक एक बाहरी व्यक्ति बने रहते हैं। यह ऐसा है जैसे इस देश की महिलाएं 'कहीं नहीं' के लोग हैं। और इससे दर्द होता है।

मुझे लगा कि 'पराया धन' शब्द का इस्तेमाल ग्रामीण भारत में कम पढ़े-लिखे परिवारों द्वारा किया जाता है। धीरे धीरे उम्र और एक्सपोसर के साथ समझ आया कि परिवार अगर पराया धन बोले भी नहीं, अपने व्यव्हार सर जाता ज़रूर देते हैं।

पहला, विवाहित बेटी के घर माता पिता रहना नहीं चाहते। वे सोचते हैं की समाज उन पर हंसेगा। धीरे धीरे वे अपनी बेटी को परिवार के फैसलों में शामिल नहीं करते। बेटी  त्यौहार के दिन बुलाया जाता है, ताकि वह ज़्यादा से ज़्यादा समय ससुराल में बिता सके। 

अगर माता-पिता अपनी विवाहित बेटियों के साथ रहते हैं तो इसे शर्मनाक क्यों माना जाता है?

समाज माता पिता के उनके बेटी के घर रहना गलत समझते हैं। पर ऐसा क्यों? क्या बेटी संतान नहीं है? क्या माता पिता बेटी से प्यार नहीं करते? क्या बेटी माता पिता से प्यार नहीं करती? 

मैंने तो यहाँ तक सुना है की बेटी अगर माता पिता के ज़्यादा करीब रहने का कोशिश कर रही है, इसका मतलब है की वह उनके पैसे चाहती है। कुछ लोग कहते हैं कि वह अपने भाई के हिस्से की विरासत हथियाने का कोशिश कर रही है।

अगर माता-पिता बेटी की देखभाल के लिए सहमत हैं तो यह बहुत बड़ा पाप क्यों है?

अब जबकि अविवाहित या विवाहित बेटियों को उनके माता-पिता की संपत्ति में समान हिस्सा दिया जाता है, तो बेटियों का यह कर्तव्य भी बन जाता है कि वे अपने बुढ़ापे में अपने माता-पिता की देखभाल करें जब उन्हें समर्थन की आवश्यकता हो। 

अदालतें कहती हैं कि विवाहित बेटी परिवार है

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में, एएस ओका और एएस चंदुरकर की बेंच द्वारा, यह माना कि विवाहित बेटियाँ अपने माता-पिता के परिवार का हिस्सा बनी रहती हैं और कोई भी नियम जो विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव करता है, वह है संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19(1)(g) का उल्लंघन है। 

एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में, उत्तराखंड उच्च न्यायालय की एक बेंच ने माना कि "एक विवाहित बेटी" को "परिवार" की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया था, और उसे कमपाशनेट अप्वाइंटमेंट के अवसर से वंचित किया गया था, भले ही वह आश्रित थी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय, यह उसके साथ लैंगिक भेदभाव होता है।

हिंदू सक्सेशन एक्ट, 2005 में बेटियों के अधिकार

इससे पहले, एक बार बेटी की शादी हो जाने के बाद, वह अपने पिता के हिंदू अविभाजित परिवार (HUF ) का हिस्सा नहीं थी। कई लोगों ने इसे महिलाओं के संपत्ति के अधिकार में कटौती के रूप में देखा। लेकिन 9 सितंबर, 2005 को, हिंदू सक्सेशन एक्ट, 1956, जो हिंदुओं के बीच संपत्ति के भाग को नियंत्रित करता है, को अमेंड किया गया। हिंदू सक्सेशन अमेंडमेंट एक्ट, 2005 के अनुसार, प्रत्येक बेटी, चाहे विवाहित हो या अविवाहित, को अपने पिता के HUF  का सदस्य माना जाता है और यहां तक ​​कि अपनी HUF संपत्ति को 'कर्ता' (जो प्रबंधन करता है) के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। अमेंडमेंट अब बेटियों को वही अधिकार, कर्तव्य, दायित्व और क्षमता प्रदान करता है जो पहले बेटों तक सीमित थे।

क्या आपको नहीं लगता कि अब समय आ गया है कि समाज भी बेटियों को उनके माता-पिता के लिए सपोर्ट सिस्टम के रूप में समझे? यदि बेटियों को शिक्षा के समान अवसर दिए जाते हैं और इसके परिणामस्वरूप वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं तो वे विवाहित या नहीं, देखभाल करने वाली क्यों नहीं हो सकतीं?

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