“स्ट्रांग इंडिपेंडेंट वुमन” कब यह पहचान दबाव में बदल गई?

एक टाइम था जब “स्ट्रांग इंडिपेंडेंट वुमन” होना एक अचीवमेंट था—फिनांकिअल्ली सेल्फ सुफ्फिसिएंट, डिसिशन खुद लेने, अपने ड्रीम्स के पीछे भागने वाली महिला।

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Dimpy Bhatt
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when did strong independent woman become a pressure

Photograph: (freepik)

“तुम तो स्ट्रांग इंडिपेंडेंट वुमन हो, तुम्हें क्या जरूरत है किसी की?” यह सुनने में तारीफ लगती है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यही टैग कई बार प्रेशर में बदल जाता है? एक टाइम था जब “स्ट्रांग इंडिपेंडेंट वुमन” होना एक अचीवमेंट था—फिनांकिअल्ली सेल्फ सुफ्फिसिएंट, डिसिशन खुद लेने, अपने ड्रीम्स के पीछे भागने वाली महिला। ये आइडेंटिटी आज भी एम्पावरमेंट का सिंबल है। लेकिन धीरे-धीरे यह एक एक्सपेक्टेशन, फिर एक स्टैण्डर्ड और अब कई बार एक बर्डन बनती जा रही है।

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“स्ट्रांग इंडिपेंडेंट वुमन” — कब यह पहचान दबाव में बदल गई?

स्ट्रांग होने की मजबूरी

आज की महिला से ये उम्मीद कि जाती है की वो करियर में सक्सेस हो, घर मैनेज करे, इमोशनली स्टेबल रहे और हर सिचुएशन में “स्ट्रांग” दिखे। अगर वो थक जाए, रो दे या मदद मांगे, तो सवाल उठते हैं—“इतनी कमजोर क्यों?” यानी मजबूती अब ऑप्शन नहीं, नेसेसिटी बन गई है। जैसे उसे हर हाल में साबित करना है कि वो सब कुछ अकेले संभाल सकती है।

इमोशंस दिखाना कमजोरी क्यों?

“स्ट्रांग” का मतलब अक्सर ये मान लिया जाता है कि आप कभी टूटेंगी नहीं। लेकिन सच्चाई यह है कि स्ट्रांग लोग भी रोते हैं, डरते हैं, उलझते हैं। जब महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वो हर टाइम बैलेंस्ड और कपबले रहें, तो वे अपने इमोशन दबाने लगती हैं। धीरे-धीरे ये प्रेशर मेन्टल थकान में बदल सकता है।

इंडिपेंडेंस vs आइसोलेशन

सेल्फ रेलिएन्ट होना अच्छा है। लेकिन जब सोसाइटी ये मान ले कि आपको किसी की जरूरत ही नहीं, तब यह आइडेंटिटी आइसोलेशन में बदल सकती है। कई महिलाएं मदद मांगने से इसलिए हिचकती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी “इमेज” टूट जाएगी। जैसे सपोर्ट लेना उनकी स्ट्रेंथ पर सवाल खड़ा कर देगा।

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सोशल मीडिया का असर

सोशल मीडिया पर “परफेक्ट लाइफ” और “हसल कल्चर” ने इस प्रेशर को और बढ़ा दिया है। हर जगह वही इमेज—सक्सेस, फिट, खुश और पूरी तरह कंट्रोल में। इस ग्लैमर के पीछे की थकान और स्ट्रगल कम ही दिखते हैं। रिजल्ट ये कि रियल लाइफ में महिलाएं खुद को कम्पेर एक ऊंरेअलिस्टिक स्टैण्डर्ड से करने लगती हैं।

बैलेंस की जरूरत

स्ट्रांग होना गलत नहीं है। लेकिन हर टाइम स्ट्रांग दिखने की मजबूरी गलत है। रियल एम्पावरमेंट ये है कि आप अपनी कमजोरी भी एक्सेप्ट कर सकें। मदद मांगना, ब्रेक लेना, “ना” कहना—ये भी ताकत के ही रूप हैं। इंडिपेंडेंस का मतलब यह नहीं कि आपको अकेले ही सब कुछ झेलना है।

इंडिपेंडेंट वुमन