ज़्यादा है तो प्रॉब्लम, कम है तो भी’—महिलाओं का ब्रेस्ट साइज क्यों बन जाता है निशाना?

महिलाओं के बॉडी को लेकर सोसाइटी के ओपिनियन कभी खत्म नहीं होते। अगर ब्रेस्ट साइज बड़ा है तो “कमेंट्स” शुरू। अगर छोटा है तो जोक्स और अनवांटेड एडवाइस।

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Dimpy Bhatt
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why does women breast size become a target

Photograph: (freepik)

महिलाओं के बॉडी को लेकर सोसाइटी के ओपिनियन कभी खत्म नहीं होते। अगर ब्रेस्ट साइज बड़ा है तो “कमेंट्स” शुरू। अगर छोटा है तो जोक्स और अनवांटेड एडवाइस। आखिर क्यों महिलाओं का ब्रेस्ट साइज इतना बड़ा इशू बना दिया जाता है?

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ज़्यादा है तो प्रॉब्लम, कम है तो भी’—महिलाओं का ब्रेस्ट साइज क्यों बन जाता है निशाना?

बॉडी नहीं, नजरिया प्रॉब्लम है

ब्रेस्ट साइज पूरी तरह बायोलॉजिकल और जेनेटिक फैक्टर पर निर्भर करता है। हर महिला की बॉडी अलग होता है। लेकिन सोसाइटी ने एक “आइडियल” फिगर की इमेज बना दी है। मीडिया, फिल्मों और सोशल मीडिया ने इस प्रेशर को और बढ़ा दिया है। एक सर्टेन बॉडी टाइप को ग्लैमराइज किया जाता है, जिससे बाकी बॉडी “इन्फीरियर” महसूस कराए जाते हैं।

कमेंट्स जो सेल्फ कॉन्फिडेंस तोड़ देते हैं

“थोड़ा वेट बढ़ाओ”, “कुछ पहनकर ढंग से रहो”, “इतना भी क्या दिखाना”—ऐसे कमेंट्स कई महिलाओं ने सुने हैं। ये कमेंट्स सिर्फ शब्द नहीं होते, बल्कि सेल्फ एस्टीम पर चोट करते हैं। अडोलेसेन्स में तो यह दबाव और ज्यादा बढ़ जाता है। स्कूल और कॉलेज के डेज में बॉडी में हो रहे बदलावों पर होने वाली कमेंटंस लंबे टाइम तक मेन्टल असर छोड़ सकती है।

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बड़ा या छोटा—दोनों में स्ट्रगल

बड़ा ब्रेस्ट साइज होने पर महिलाओं को अनवांटेड स्टेर, फिजिकल डिस्कम्फर्ट और कपड़ों को लेकर लगातार जजमेंट झेलना पड़ता है। वहीं छोटा साइज होने पर “कम फेमिनिन” होने का टैग दे दिया जाता है। यानी प्रॉब्लम साइज नहीं, बल्कि सोसाइटी की सोच है—जो महिलाओं के बॉडी को एक ऑब्जेक्ट की तरह देखती है।

मेडिकल और नैचुरल वेरिएशन

ब्रेस्ट साइज हार्मोन, ऐज, वेट और प्रेग्नेंसी जैसे कई फैक्टर्स से समय-समय पर बदल सकता है। पीरियड साइकिल, जेनेटिक्स और लाइफस्टाइल भी इसमें रोले निभाते हैं। ये बॉडी का पूरी तरह नार्मल और बायोलॉजिकल पार्ट है—कोई “कैरेक्टर सर्टिफिकेट” या ब्यूटी मैसूर का नहीं।

बातचीत और बॉडी पॉजिटिविटी की जरूरत

आज जरूरत है कि बॉडी पॉजिटिविटी सिर्फ ट्रेंड न रहे, बल्कि सोच का हिस्सा बने। फॅमिली और फ्रेंड्स की रिस्पांसिबिलिटी है कि वे कमेंट करने की बजाय सपोर्ट करें। महिलाओं को भी यह समझना जरूरी है कि उनकी बॉडी किसी की एडवाइस पर निर्भर नहीं। साइज से न तो सेल्फ कॉन्फिडेंस तय होता है, न ही खूबसूरती।

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आखिर सवाल यही है

जब बॉडी नेचुरल है, तो क्रिटिसाइज़ क्यों? क्यों महिलाओं के ब्रेस्ट साइज को टॉपिक ऑफ़ डिस्कशन बना दिया जाता है, जैसे वह उनकी आइडेंटिटी का केंद्र हो?

ब्रेस्ट सेल्फ कॉन्फिडेंस