Women Rights: महिलाओं के साहस से डरता है पितृसत्तात्मक समाज

Women Rights: महिलाओं के साहस से डरता है पितृसत्तात्मक समाज Women Rights: महिलाओं के साहस से डरता है पितृसत्तात्मक समाज

Swati Bundela

21 Sep 2022

हमारा समाज आज भी अपने हक के लिए बोलने और खड़ी होने वाली लड़कियों या महिलाओं को अच्छे नजरिए से नही देखता है। पितृसत्तात्मक समाज हमेशा महिलाओं की आवाज को अनसुना करता आया है। जब महिलाएं अपनी आवाज बुलंद करती है और अपने हक की मांग करती है तो यही समाज उन्हें 'स्वार्थी और बिगडैल' होने का खिताब दे देता है।

महिलाओं की आवाज नजरअदांज करता है समाज

महिलाओं से यही उम्मीद की जाती है कि उनके साथ जो भी होता है वह चुपचाप सहन करती रहे और कोई आवाज न उठाए। अगर वह ऐसा करती है तब ही वह समाज में संस्कारी कहलाती है और उनका यही व्यावहार समाज में उनके घर-परिवार की इज़्ज़त भी बनाये रखता है। लेकिन जब महिलाएं अपने अधिकारों और अपने साथ होने वाले अन्याय को समझती है और अपने लिए बोलना शुरू करती हैं, तो समाज उनके चरित्र पर सवाल करने लगता है। 

उनको सिर्फ अपने बारे में ही सोचने वाला बोलकर स्वार्थी बतलाता है। वही अगर यही काम पुरुष करे तो समाज को कोई परवाह नहीं होती है। क्योंकि पुरुषों से यही अपेक्षित है की अगर उनके साथ कुछ गलत होता है या उनके आधिकारो का हनन होता है तो वे अपने लिए लड़े। लेकिन महिलाओं से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती अपितु उनकी आवाज को दबा दिया जाता है।

समाज को डराता है महिलाओं का साहस

वास्तव में हमारा समाज हर उस महिला से डरता है जो अपने अधिकारों के लिए बोलना जानती है। ऐसी महिलाएं पितृसत्तात्मक समाज के लिए एक डर के रूप में देखी जाती है। इसलिए ये समाज उनकी बहादुरी को नजरअंदाज करते हुए उनका मनोबल तोड़ने पर लगा रहता है। उनको लगातार एहसास कराया जाता है की वे अच्छी महिलाओं की गिनती में नहीं आती है और उनका ऐसा रवैया समाज में महिलाओं के लिए शर्म की बात है।

समाज के डर से न रहे चुप

यह समाज आपको गिराने की कोशिश जारी रखेगा लेकिन महिलाओं को यह समझना होगा की भले ही ये समाज आपको 'संस्कारी महिला' की श्रेणी में नहीं रखता है, इसका मतलब यह नहीं की आप अपने खिलाफ होने वाले दुर्व्यवहार को बर्दाश्त करती रहे। आप किसी परिभाषा में फिट होने के लिए नहीं बनी है, बल्कि आप खुद को खुद परिभाषित करे। साथ ही समाज को यह समझने की जरुरत है की बहादुर और साहसी महिलाएं समाज के लिए एक 'एसेट' है। वे इस समाज को न सिर्फ महिलाओं के लिए बल्कि हर जेंडर और सेक्स के लिए बेहतर बना सकती है। 

इसलिए जब कोई महिला अन्याय के प्रति अपनी आवाज बुलंद करे तो हमे चाहिए की हम उनका साथ दे जिससे एक बेहतर समाज का निर्माण संभव हो सके, ना की उनको स्वार्थी और बिगड़ैल बताकर सालो से चलते आ रहे इस भेदभाव को जारी रखे।

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