फिलोफोबिया क्या है? जब कमिटमेंट ही बन जाए सबसे बड़ा डर

प्यार में रिस्क होता है, लेकिन पूरी तरह सिक्योर रहने की कोशिश हमें खुशी से भी दूर कर सकती है। फिलोफोबिया हमें ये यकीन दिलाता है कि डिस्टेंस ही सिक्योरिटी है।

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Dimpy Bhatt
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philophobia when commitment becomes your biggest fear

Photograph: (freepik)

कुछ लोग प्यार चाहते हैं, लेकिन जैसे ही रिश्ता थोड़ा सीरियस होने लगता है, वे पीछे हट जाते हैं। मैसेज कम हो जाते हैं, मीटिंग्स टलने लगते हैं, और “मुझे थोड़ा स्पेस चाहिए” जैसी बातें सामने आ जाती हैं। अगर यह पैटर्न बार-बार रिपीट किया जा रहा है, तो पॉसिबल है कि बात सिर्फ कमिटमेंट इश्यू की नहीं, बल्कि फिलोफोबिया की हो।

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फिलोफोबिया क्या है? जब कमिटमेंट ही बन जाए सबसे बड़ा डर

फिलोफोबिया आखिर है क्या?

फिलोफोबिया का मतलब है—प्यार में पड़ने या किसी के साथ डीप इमोशनल कनेक्शन से डर। ये नार्मल एंग्जायटी से अलग है। यहां डर इतना इंटेंस होता है कि लोगअनजाने में हर पोटेंशियल रेलशनाहीप  खुद ही खराब कर देता है, ताकि उसे चोट न लगे।

यह डर आता कहां से है?

अक्सर ये डर पुराने एक्सपीरियंस से आता हैं। कोई पेनफुल ब्रेकअप, बिट्रेयल, या बचपन में पेरेंट्स का अन्स्टेबल रिलेशनशिप देखना—ये सब मन में यह बिलीफ बना सकते हैं कि “प्यार का एन्ड पेनफुल ही होता है।” कुछ लोगों में कम सेल्फ एस्टीम या रिजेक्शन का डर भी इतना ज़्यदा होता है कि वे पहले ही डिस्टेंस बना लेते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वो पूरी तरह जुड़ गए, तो वे वीक पड़ जाएंगे।

इसके संकेत क्या हो सकते हैं?

जैसे रिलेशनशिप सीरियस होते ही अचानक डिस्टेंस बना लेना, फ्यूचर की बातों को अवॉयड करना, पार्टनर की छोटी-छोटी कमियां निकालकर रिश्ता खत्म कर देना, इमोशनल बातचीत से उनकंफर्टबले हो जाना और बार-बार “मैं अभी रेडी नहीं हूं” कहना। कई बार ऐसे लोग खुद भी कन्फ्यूज रहते हैं; उन्हें लगता है कि वो राइट पर्सन नहीं ढूंढ पा रहे, जबकि असल में वो अपने ही डर और कमिटमेंट के रिस्क से बचने की कोशिश कर रहे होते हैं।

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क्या यह सिर्फ एक्सक्यूज़ है?

हर बार कमिटमेंट से बचना फिलोफोबिया नहीं होता। कभी-कभी लोग सच में तैयार नहीं होते। लेकिन अगर डर आपको हेअल्थी और रिस्पेक्टफुल रिलेशनशिप से भी दूर रख रहा है, तो इसे समझना जरूरी है। फिलोफोबिया धीरे-धीरे लोनेलिनेस्स और इमोशनल थकान की ओर ले जा सकता है। 

इससे कैसे डील करे?

सबसे पहला स्टेप है—अपने डर को एक्सेप्ट करना। खुद से पूछें, “क्या मैं इस रिश्ते से भाग रहा/रही हूं क्योंकि यह गलत है, या इसलिए क्योंकि मैं डर रहा/रही हूं?” धीरे-धीरे ट्रस्ट बनाना सीखें। हर रिश्ता पास्ट जैसा नहीं होता। अगर ओल्ड वोँड गहरे हैं, तो थेरेपी या काउंसलिंग मदद कर सकती है। पार्टनर से खुलकर बात करना भी जरूरी है। अपनी इन्सेक्युरिटीज़ शेयर करना वीकनेस नहीं, बल्कि रिश्ते को स्ट्रांग बनाने की शुरुआत है।

प्यार vs सिक्योरिटी 

प्यार में रिस्क होता है, लेकिन पूरी तरह सिक्योर रहने की कोशिश हमें खुशी से भी दूर कर सकती है। फिलोफोबिया हमें ये यकीन दिलाता है कि डिस्टेंस ही सिक्योरिटी है। कमिटमेंट स्केरी हो सकता है, लेकिन वही हमें डेप्थ, ट्रस्ट और सच्चा साथ भी देता है। कभी-कभी सबसे बड़ा स्टेप डर से भागना नहीं, बल्कि उसके साथ आगे बढ़ना होता है।

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रिलेशनशिप पार्टनर