Why Sons Need Feminism? बेटों को फेमिनिस्ट परवरिश कैसे दें, और क्यों?

Why Sons Need Feminism? बेटों को फेमिनिस्ट परवरिश कैसे दें, और क्यों? Why Sons Need Feminism? बेटों को फेमिनिस्ट परवरिश कैसे दें, और क्यों?

Monika Pundir

27 Jun 2022

फेमिनिज्म का अर्थ है हर जेंडर के लिए समान अधिकार। हालांकि संविधान के अनुसार आदमी और औरत को समान अधिकार मिलते हैं, असल ज़िन्दगी में यह अभी तक हासिल नहीं हो पाया है। उदाहरण के तौर पर, आदमी का काम करना ज़रूरत और औरत का काम करना उसकी खुशकिस्मती माना जाता है। 

बेटों को भी फेमिनिस्ट परवरिश की ज़रूरत क्यों है? 

जैसे की हमने बात की है, कि फेमिनिज्म इक्वलिटी या बराबरी के बारे में हैं, ख़ास अधिकार के बारे में नहीं, हमें यह भी समझना होगा की पुरुषों को भी बराबरी की ज़रूरत है। पैट्रिआर्की पुरुष के लिए भी हानिकारक होता है। देखते हैं कैसे।

पुरुष प्रधान समाज पुरुषों के लिए हानिकारक कैसे है?

  • कमाने का पूरा भार आदमी, पति, पिता या बेटे पर होता है। 
  • जो आदमी अपने पत्नी के पैसे का प्रयोग करे, उसका मज़ाक उदय जाता है, ‘नामर्द’ कहा जाता है।
  • अगर किसी आदमी की नौकरी चली जाये, उसका समाजिक तिरस्कार तो होता ही है, साथ ही, अगर उसकी पत्नी को काम करने की इजाज़त नहीं थी, तो उसके परिवार की फाइनेंसियल स्थिति ख़राब हो जाती है।
  • आदमी को हाई पेइंग जॉब्स, यानी डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी में से चुनना होगा। अगर किसी लड़के का पैशन डांस हो, उसका परिवार उसे वह चुनने नहीं देता।
  • जो आदमी हाउस हस्बैंड बनना चाहे, उसका बुरी तरीके से मज़ाक उड़ाया जाता है।
  • क्योंकि औरतों को कमज़ोर माना जाता है, कुछ औरते फेक रेप केस लगा कर आदमी की ज़िन्दगी बर्बाद कर देते हैं, क्योंकि सब उनकी सरलता से विश्वास करते हैं।
  • आदमी के मेंटल हेल्थ को पूरी तरह इग्नोर की जाती है।
  • जो आदमी/लड़के रेप, सेक्सुअल अब्यूस या डोमेस्टिक विजलेंस के शिकार होते हैं, उन्हें या तो इन्साफ नहीं मिलता, या बहुत देर से मिलती है।
  • आदमी के खिलाफ भी सेक्सिस्ट स्टीरियोटाइप हैं।

अपने बच्चे को फेमिनिस्ट परवरिश कैसे दे?

1. अपने बच्चों में फर्क न करें

आप अपनी बेटी को जो सिखाते हैं, बेटे को भी सिखाएं और बेटे को जो सिखाते हैं, बेटी को भी सिखाएं। दोनों बच्चो को चाय बनाना और गाड़ी चलना, दोनों सिकने चाहिए। अगर आपका बेटा घर से दूर जाए, उसे कभी तो खाना पकने की ज़रूरत पड़ेगी। अपने बेटे को भी इंडिपेंडेंट बनाए।

2. अपने बच्चों को उसके इंटरेस्ट के आधार पर खिलौने दें

लड़की के लिए किचन सेट और गुड़िया और लड़के के लिए गाड़ी और बन्दूक, यह सबसे पुराणी स्टेरोटाइप है। रिसर्च ने पाया है कि 3 साल के उम्र तक बच्चे की कोई जेंडर आइडेंटिटी नहीं होती। अगर आप उसे न कहे की लड़के गुड़िया से नहीं खेलते, वह भी ऐसा नहीं सोचेगा। इसलिए छोटे, मासूम बच्चों को अपनी मर्ज़ी से खिलौने चुनने दें, न की अपने स्टेरोटाइप उनपे इम्पोस करें।

3. करियर चॉइस की स्वतंत्रता दे 

अगर आपका बच्चा आर्ट्स पढ़ना चाहे या टीचर बनना चाहे, उनसे यह न कहिये की वह लड़कियों के लिए है या उसमें पैसे कम हैं। अगर व्यक्ति मेहनती है, वह किसी भी करियर में बहुत सफलता पा सकता है। पर अगर वह ज़बरदस्ती डॉक्टर बन जाए, न वो खुश रह पायेगा, न ही उस फिल्ड में अच्छा कर पायेगा। 

4. पीरियड्स से न शर्माए 

पीरियड्स का होना मतलब शरीर का स्वस्थ होना। इसलिए पीरियड्स शर्माने वाली चीज़ नहीं है। इस समय अधिकतर भारतीय पुरषों को पीरियड्स के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है, और महिलाओं को भी बैर-मिनिमम जानकारी है। इससे बदलने की ज़रूरत है। 

अगर आपका बच्चा पैड का पैकेट या एड देखकर सवाल करे तो उसे डटिएगा मत। बच्चों को प्यूबर्टी से पहले अपने प्राइवेट पार्ट्स के बारे में बात करने में (कम से कम माता पिता से) शर्म नहीं आती। इसलिए लड़का हो या लड़की, अगर आप सरल भाषा में डाइजेशन या रेस्पिरेशन के तरह उन्हें पीरियड्स के बारे में समझाए तो वे समझ जायेंगे। इससे कुछ सालों में पीरियड्स के बारे में टैबू भी ख़तम हो जायेगा, और हो सकता है की बच्चा अपनी माँ या बहन की मदद भी करेगा।

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