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Photograph: (New UGC equity regulations spark student protests, political fallout in U.P, THE HINDU)
2026 में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने "Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations" नाम से नई गाइडलाइन्स जारी की हैं। इनका उद्देश्य कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जाति आधारित भेदभाव को रोकना और सभी छात्रों को सुरक्षित माहौल देना है। लेकिन इन नियमों को लेकर देशभर में General Category छात्रों में गहरी चिंता और विरोध देखने को मिल रहा है।
न्याय या असंतुलन? UGC की नई गाइडलाइन्स और छात्रों की चिंता
ये गाइडलाइन्स क्यों लाई गईं?
इन नियमों को लाने की मुख्य वजह दो दुखद घटनाएँ रही हैं-
रोहित वेमुला (2016) हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र, जिन्होंने कथित जातिगत उत्पीड़न के कारण आत्महत्या की।
पायल तड़वी (2019) – मुंबई की मेडिकल छात्रा, जिनकी आत्महत्या का कारण भी कथित जातिगत उत्पीड़न बताया गया।
इन मामलों के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई, जिसके बाद UGC को 2012 की Anti Discrimination policy को और सख्त बनाने का निर्देश दिया गया। इसके तहत 2026 में नई इक्विटी guidelines लागू की गईं, ताकि SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोका जा सके।
नई गाइडलाइन्स में क्या-क्या प्रावधान हैं?
- हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में Equal Opportunity Centre (EOC) बनेगा
- Equity Committee और Equity Squad गठित की जाएगी
- 24 घंटे की हेल्पलाइन
- शिकायत मिलने पर 24 घंटे में जांच शुरू
- 15 दिनों में फैसला अनिवार्य
- संस्थानों पर सख्त निगरानी और रिपोर्टिंग
- इन नियमों का मकसद है कि जाति आधारित उत्पीड़न पर तुरंत कार्रवाई हो और पीड़ित छात्रों को जल्दी न्याय मिले।
General Category छात्रों पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?
हालाँकि नियमों की मंशा अच्छी है, लेकिन General Category छात्रों को इसमें कई गंभीर खामियाँ दिखाई दे रही हैं:
1. शिकायत करने का बराबर अधिकार नहीं
नियमों में स्पष्ट रूप से केवल SC, ST और OBC वर्ग की सुरक्षा का उल्लेख है, जबकि General Category छात्रों के लिए कोई अलग शिकायत प्रणाली तय नहीं की गई, जिससे उन्हें लगता है कि उनकी समस्याएँ अनसुनी रह जाएँगी।
2. झूठीशिकायतोंपरकोईसख्तसज़ानहीं
नई गाइडलाइन्स में **फर्जी या गलत शिकायत करने पर दंड का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिससे नियमों के दुरुपयोग का डर बढ़ जाता है। छात्रों को आशंका है कि व्यक्तिगत दुश्मनी या बदले की भावना से झूठे केस किए जा सकते हैं, जिससे उनका करियर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
3. “पहले दोषी, बाद में निर्दोष” जैसी स्थिति
24 घंटे में जांच शुरू होने और 15 दिनों में फैसला देने की बाध्यता के कारण, कई मामलों में बिना पूरी जांच के छात्र को निलंबित, हॉस्टल से बाहर या क्लास से रोका जा सकता है, जो भारतीय न्याय प्रणाली के "निर्दोष जब तक दोष सिद्ध न हो" सिद्धांत के खिलाफ माना जा रहा है।
4. Equity Committees में General Category प्रतिनिधित्व नहीं
Equity Committees में General Category का प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है, जिससे छात्रों को लगता है कि जांच एकतरफा हो सकती है।
देशभर में विरोध क्यों हुआ?
इन सभी कारणों से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी जैसे कई शहरों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए, ज्ञापन सौंपे और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई, जिसमें कहा गया कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करते हैं।
UGC की मंशा सकारात्मक और जरूरी है, क्योंकि जातिगत भेदभाव एक गंभीर समस्या है। लेकिन नियम तभी प्रभावी होंगे जब वे सभी छात्रों के लिए निष्पक्ष, संतुलित और पारदर्शी हों।
समानता का अर्थ केवल किसी एक वर्ग की सुरक्षा नहीं, बल्कि हर छात्र को न्याय देना है।
यदि इन गाइडलाइन्स में General Category छात्रों की सुरक्षा, झूठी शिकायतों पर सज़ा और निष्पक्ष जांच की व्यवस्था जोड़ दी जाए, तो यह नीति वास्तव में सभी के लिए लाभकारी बन सकती है।
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