वो पहली बार पीरियड्स का आना और फिर उन दिनों होने वाली मरोड़ की आदत-सी पड़ जाना। महिलाएँ अपने जीवन में ऐसे-ही कई तरह के शारीरिक बदलावों से रूबरू होती हैं। और इन्हीं बदलावों में एक नाम जुड़ा है – मेनोपॉज़ का।

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मेनोपॉज़ क्या है ?

महिलाओं में पीरियड्स का बंद हो जाना, मेनोपॉज़ कहलाता है। मेनोपॉज़ को रजोनिवृत्ति भी कहा जाता है।

मेनोपॉज़ का सीधा मतलब है, महिला अब गर्भधारण करने के लिए असमर्थ है। अमूमन, यह स्तिथि पचास साल के बाद आती है। मगर कुछ महिलाओं में, पचास वर्ष से पहले-ही आ जाती हैं।

पूरे एक साल तक पीरियड्स ना होने पर, मेनोपॉज़ कहा जाता है।

मेनोपॉज़ क्यों होता है ?

मेनोपॉज़ होने का मुख्य कारण है, महिलाओं की ओवरी या अंडाशय में एस्ट्रोजेन (oestrogen) और प्रोजेस्टेरोन (progesterone) नाम के हॉर्मोन का बनना, बंद हो जाना। इन हॉर्मोन के ना बनने के कारण अंडा, ओवरी से बाहर नहीं आ पाता। अंडा बाहर ना आने के कारण, गर्भाशय खुद को गर्भधारण करने को तैयार नहीं करता। और ना ही पीरियड्स होते है।

एक तय उम्र के बाद, जैसे हम कुछ चुनिंदा काम करना बंद कर देते है। ठीक वैसे ही, हमारा शरीर भी कुछ काम बंद कर देता है। और यह बेहद सामान्य है। इससे घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं।

मेनोपॉज़ के लक्षण और उपाय

मेनोपॉज़ के लक्षण, अक्सर महिलाओं को चिंता मे डाल देते है। इसीलिए महिलाओं के लिए, मेनोपॉज़ के लक्षणों को समझना बेहद जरूरी है।

  • पूरे शरीर में गर्माहट का महसूस होना, इसे हॉट फ्लैश भी कहा जाता है। यह मेनोपॉज़ का सबसे पहला और मुख्य लक्षण माना जाता है।
  • वजाइना मे रूखापन महसूस होना।
  • नींद बेहद कम आना और बेचैनी महसूस होना।
  • भूख का बेहद कम हो जाना।
  • वजाइना में दर्द की शिकायत रहना और सामान्य से अधिक पेशाब आना।
  • यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (urinary tract infection) का हो जाना।
  • मन उदास रहना या डिप्रेशन।
  • बालों का झड़ना और त्वचा का रूखा हो जाना।
  • कुछ मामलों में मेनोपॉज़ के बाद ऑस्टियोपोरोसिस रोग होने का भी खतरा रहता है। इस रोग मे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। और जल्दी फ्रैक्चर होने का खतरा बढ़ जाता है।

मेनोपॉज़, महिलाओं में होने वाला एक जरूरी शारीरिक बदलाव है। इसे बचा नहीं जा सकता। मगर मेनोपॉज़ के समय अपना अधिक ध्यान रखके, इससे होने वाली तकलीफ़ को कई हद तक कम किया जा सकता है।

  • मेनोपॉज के बाद शरीर में कैल्शियम की ज्यादा जरूरत होती है। ऐसे में डॉक्टर की सलाह पर सप्लिमेंट्स का प्रयोग कर सकती है।
  • अपने भोजन पर बेहद ध्यान देने की जरूरत होती है। समय पर और पौष्टिक भोजन लेना, बिल्कुल न भूलें।
  • तैलीय और मीठा खाने से परहेज़ करें। फल, सब्जियां और साबुत अनाज को अपने भोजन में शामिल करें।
  • रोजाना 30 से 40 मिनट व्यायाम को अपने दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ।
  • खुद को खुश रखें और किसी भी प्रकार के स्ट्रेस (stress) से बचें।

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