/hindi/media/media_files/2026/01/24/anger-is-an-emotion-and-men-use-it-freely-2026-01-24-13-47-43.png)
Photograph: (freepik)
गुस्सा भी उतना ही एक इमोशन है, जितना हैप्पीनेस, फियर या सैडनेस। लेकिन सोसाइटी ने इमोशन्स को जेंडर के व्यू से देखना सीख लिया है। जहाँ पुरुषों के गुस्से को अक्सर “नेचुरल रिएक्शन”, “स्ट्रेस का नतीजा” या “मस्क्युलिनिटी” से जोड़ दिया जाता है, वहीं महिलाओं के गुस्से को ओवररिएक्शन, रुडेनेस्स या कंट्रोल न कर पाने की निशानी माना जाता है। यही फर्क इस बात को दिखाता है कि गुस्सा एक इमोशन होते हुए भी सिर्फ पुरुषों को इसे खुलकर जताने की छूट क्यों मिल जाती है।
गुस्सा एक इमोशन है, और पुरुष इसका खुलकर इस्तेमाल करते हैं
गुस्से को स्ट्रेंथ क्यों माना जाता है?
बचपन से ही लड़कों को यह सिखाया जाता है कि गुस्सा आना नॉर्मल है। प्लेग्राउंड से लेकर वर्कप्लेस तक, उनका गुस्सा अक्सर “पैशन” या “लीडरशिप क्वालिटी” समझ लिया जाता है। अगर कोई पुरुष ऊँची आवाज़ में अपनी बात रखता है, तो उसे सीरियस लिया जाता है। सोसाइटी ने गुस्से को पुरुषों की ताक़त बना दिया है।
महिलाओं का गुस्सा क्यों अनकंफरटेबल है?
जब महिलाएँ गुस्सा करती हैं, तो माहौल अचानक उनकंफर्टबले हो जाता है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे शांत रहें, समझदारी दिखाएँ और बात को हल्के में लें। उनका गुस्सा अक्सर “मूड स्विंग्स” या “इमोशनल होना” कहकर टाल दिया जाता है। इससे न सिर्फ़ उनकी बात दब जाती है, बल्कि उन्हें खुद भी अपने गुस्से पर डाउट होने लगता है।
वर्कप्लेस से लेकर रिश्तों तक यही पैटर्न
ऑफिस में अगर कोई पुरुष गुस्से में बोलता है, तो उसे डिसाइज़िव माना जाता है। वहीं महिला अगर वही टोन अपनाए, तो उसे अग्रेसिव कह दिया जाता है। रिश्तों में भी यही होता है—पुरुष का गुस्सा जायज़, महिला की नाराज़गी ड्रामा। ये डबल स्टैंडर्ड गुस्से को जेंडर से जोड़ देता है, इमोशन से नहीं।
गुस्सा दबाना भी हार्मफुल है
महिलाओं को अक्सर सिखाया जाता है कि गुस्सा मत दिखाओ, एडजस्ट करो। लेकिन लगातार गुस्से को दबाना मेंटल और इमोशनल हेल्थ पर असर डालता है। गुस्सा दबने से खत्म नहीं होता, बल्कि दूसरी तरीके में बाहर आता है—चुप्पी, थकान या खुद से नाराज़गी बनकर।
इमोशन्स में बराबरी ज़रूरी है
गुस्सा किसी एक जेंडर की प्रॉपर्टी नहीं है। यह हर इंसान का राइट है कि वह अपनी नाराज़गी को रेस्पेक्ट के साथ एक्सप्रेस कर सके। जब तक हम पुरुषों के गुस्से को नॉर्मल और महिलाओं के गुस्से को प्रॉब्लम मानते रहेंगे, तब तक इमोशनल इक्वैलिटी अधूरी रहेगी। गुस्सा एक इमोशन है—न स्ट्रेंथ, न वीकनेस। फर्क बस इतना है कि सोसाइटी ने पुरुषों को इसे खुलकर इस्तेमाल करने की छूट दे दी है।
/hindi/media/agency_attachments/zkkRppHJG3bMHY3whVsk.png)
Follow Us