महिलाओं को ‘इमोशनल’ कहना सच को दबाने का सबसे आसान तरीका है

महिलाओं जब भी अपनी बात रखने, सवाल पूछने या किसी बात को एक्सप्रेस करने की कोशिश करती हैं, तो अक्सर एक ही बात सुनने को मिलता है—“तुम बहुत इमोशनल हो।”

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Dimpy Bhatt
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Calling women emotional is the easiest way to suppress the truth

Photograph: (freepik)

महिलाओं जब भी अपनी बात रखने, सवाल पूछने या किसी बात को एक्सप्रेस करने की कोशिश करती हैं, तो अक्सर एक ही बात सुनने को मिलता है—“तुम बहुत इमोशनल हो।” यह बात सुनने में भले ही इजी लगे, लेकिन असल में ये महिलाओं की बातों को साइडलाइन करने का सबसे आसान तरीका बन चुका है। ‘इमोशनल’ कहना एक लेबल है, जिसके पीछे छुपकर उनकी बातों को, प्रॉब्लम को और आर्ग्यूमेंट्स को सीरियस नहीं लिया जाता।

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महिलाओं को ‘इमोशनल’ कहना सच को दबाने का सबसे आसान तरीका है

1. सवाल करना इमोशनल कैसे हो गया?

जब महिलाएँ किसी रिश्ते, काम या फॅमिली से जुड़ी परेशानी पर सवाल उठाती हैं, तो उसे लॉजिक की जगह इमोशन से जोड़ दिया जाता है। अगर वे अपनी फीलिंग्स के साथ अपनी बात को कहती हैं, तो ये कह दिया जाता है कि वे इल्लॉजिकल है। जबकि सच यह है कि अपनी फीलिंग के साथ बात रखना वीकनेस नहीं, बल्कि आनेस्टी है।

2. बात सुनने से बचने का आसान तरीका 

किसी महिला को ‘इमोशनल’ कह देना दरअसल सामने वाले को जिम्मेदारी से बचा लेता है। इससे न तो उसकी बात समझनी पड़ती है और न ही किसी बदलाव की ज़रूरत महसूस होती है। यह एक तरह का शॉर्टकट है, जिससे उनकंफर्टबले बातचीत से बचा जा सके।

3. गुस्सा और रोना के बिच में फर्क

अगर कोई पुरुष गुस्सा करता है, तो उसे स्ट्रॉन्ग ओपिनियन या स्ट्रेस का रिज़ल्ट माना जाता है। लेकिन जब महिला रोती है या इमोशनल होती है, तो उसे ओवररिएक्शन कहा जाता है। सोसाइटी ने तय कर दिया है कि कौन-सा इमोशन अक्सेप्टबले है और कौन-सा नहीं—और यह तय करने में महिलाओं को हमेशा इन्फीरियर माना गया है।

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4. इमोशनल होना वीकनेस नहीं

इमोशनल होना मतलब अपनी फीलिंग्स से जुड़ा होना, उन्हें समझना और एक्सप्रेस करना। यह किसी भी इंसान की सबसे बड़ी ताक़त हो सकती है। लेकिन महिलाओं के केस में इसे उनकी काबिलियत पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है—चाहे वह ऑफिस हो या पर्सनल लाइफ।

5. लेबल से आगे देखने की ज़रूरत

हर बार महिलाओं को ‘इमोशनल’ कहकर चुप करा देना एक इजी रास्ता है, लेकिन सही नहीं। ज़रूरत इस बात की है कि उनकी बात सुनी जाए, समझी जाए और उस पर सोच-विचार किया जाए। अब ये टाइम है कि इस लेबल से आगे बढ़कर बातों के रियल रीज़न को और मीनिंग को समझा जाए।

ओपिनियन इमोशनल