कोरोना के शुरवात से ही भारत में महिलाओं को बहुत साड़ी परेशानियों का सामना करना पर रहा है। इस दूसरी वेव के कारण एक बार फिर उनके साथ बहुत सारी नाइंसाफी देखने को मिल रही है। ऐसी परिस्थितियां इकनोमिक रिकवरी को भी खतरे में डाल रही है। पहले से ही सैलरी में इनक्वॉलिटी की मार झेल रही महिलाओं के लिए जॉब का ना रहना महिलाओं को बहुत ज़्यादा इफ़ेक्ट कर रहा है। इस कारण जेंडर गैप जो पहले से ही एक ख़राब स्तिथि में है और बिगड़ चुका है। जानिए क्या हो रहा है असर महिलाओं पर:

1. एम्प्लॉयमेंट में हो रहा है लॉस

कई राज्यों के लॉकडाउन लगाने के प्रकरण से इकॉनमी में लगातार घटाव देखने को मिल रहा है। ऐसे में एक सर्वे के मुताबिक पिछले दो महीनों में पूरे देश में कम से कम 17 मिलियन लोगों की नौकरी गई है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा महिलाओं का है क्योंकि उनके अनएम्प्लॉयमेंट दर में 17 प्रतिशत वृद्धि हुई है जो की मर्दों के मुकाबले दुगनी है।

2. लेबर पॉपुलेशन में गिरावट

शोध बताते हैं की जिन महिलाओं की इस दौरान नौकरी गई है उन्होंने फिर नई नौकरी ढूंढने की ज़्यादा चेष्टा नहीं की है। अप्रैल महीने में देखा जाये तो कुल लेबर पार्टिसिपेशन में महिलाओं का हिस्सा केवल 8.8 प्रतिशत रह गया है। महिलाओं की माने तो ऐसे हालत में नौकरी करना उनके लिए बहुत कठिन हो गया है।

3. सैलरी में हुई है गिरावट

महिलाओं की सैलरी में इस महामारी का बहुत असर हुआ है। एक सर्वे की माने तो भारत में जिस तेज़ी से कोरोना के केसेस बढ़ रहें हैं उसी तेज़ी से महिलाओं की सैलरी में गिरावट हो रही है। महिलाओं की साप्ताहिक इनकम में 76 प्रतिशत तक गिरावट हुई है। ऐसी परिस्थितियों में अपने और अपने परिवार का ख्याल रखने के लिए कई महिलाओं ने अपने सेविंग्स की कुर्बानी दी है।

4. मेन्टल हेल्थ पे हो रहा है असर

अभी हाल में हुए एक शोध के मुताबिक भारत में काम करने वाले लोगों के मेन्टल हेल्थ पर इस कोरोना के कारण बहुत ज़्यादा असर हो चुका है। इस कारण जेंडर गैप और बढ़ता जा रहा है। भारत में 25 प्रतिशत से भी कम महिलाएं अभी वर्क फाॅर्स का हिस्सा है और उन्हें मर्दों के मुकाबले 35 प्रतिशत कम सैलरी मिलती है।

5. वैक्सीनेशन में भी हो रही है इनक्वॉलिटी

भारत के कुल वूमेन पॉपुलेशन में से सिर्फ 39 प्रतिशत महिलाएं ही वैक्सीन लगाने की इच्छुक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि महिलाएं वर्क फ्रंट पर अग्रसर नहीं है इसलिए उनको वैक्सीन लगाया जाये इस बात को सेकेंडरी मन जा रहा है। सोसाइटी की पैट्रिआर्की की घटिया सोच के मद्देनज़र भी कई महिलाओं को सिर्फ इसलिए वैक्सीन लगवाने में दिक्कतों का सामना करना पर रहा हिअ क्योंकि वो इस बात का फैसला खुद से खुद के लिए नहीं ले पा रही हैं। उनके लिए फैसलें लेने वाले मर्दों के नज़र में उनको वैक्सीन की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि वो दिन भर घर में रहती हैं।

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