मैं हमेशा सोचता था कि जब मेरे भाई बहन सेनेटरी पैड के विज्ञापन टेलीविजन स्क्रीन पर देखते होंगे तो काफी अनकंफरटेबल महसूस करते होंगे। मैंने अपनी फैमिली में कभी भी सैक्सुअल बिहेवियर, पीरियड्स या प्रेगनेंसी से संबंधित कोई बातचीत नहीं की। मुझे याद है, जब मैं अपनी माँ से पूछता था, ‘प्रेग्नेंट’ का क्या मतलब होता है ? तो मेरी मां मुझे आंखें दिखा देती और कहती ‘ये गंदी बात होती है’।

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आखिर क्यों महिलाएं और पुरुष अपनी समस्याओं के बारे में खुलकर बात नहीं कर सकते हैं?

एक दिन मेरी माँ ने मेरे भाई से आरती करने को कहा और मेरे भाई ने मेरी बहन को करने के लिए कहा। मेरी माँ ने विरोध किया और कहा, “वो नहीं कर सकती”। मेरा भाई हैरान था और उसने पूछा, “क्यों?” “वह ऐसा नहीं कर सकती!” मेरी माँ ने जवाब दिया। जब भी मेरी मां या बहन पीरियड्स से गुजरती है , तो वह आरती नहीं करती है। मैं समझ गया और मेरा भाई भी, उसके बाद वही पुराना अजीब सा सन्नाटा।

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जब राष्ट्रवाद की बात आती है तो हम सारी सेवाओं व सामानों का बहिष्कार करने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन जब हम जेंडर इनिक्वालिटी की बात करते हैं तो हमें मुंह बंद रखने के लिए कहा जाता है। आखिर क्यों महिलाएं और पुरुष अपनी समस्याओं के बारे में खुलकर बात नहीं कर सकते हैं?

स्टिग्मास को तोड़ने की शुरुआत, सबसे पहले अपने परिवार से करनी पड़ेगी

सोसाइटी चाहती है कि मां बाप अपने बच्चों का ‘चरित्र निर्माण’ करें। लेकिन कैरेक्टर डेवलपमेंट में फिजिकल चेंज और हार्मोनल डेवलपमेंट के बारे में बात करना शामिल नहीं है । जब हम कैरेक्टर की बात करते हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि “किसी का स्वभाव’। लेकिन हमारा शरीर और हार्मोन हमारे नेचर को भी प्रभावित करते हैं।

हम समाज में तब तक बदलाव नहीं ला सकते जब तक हम ‘शर्म’ जैसे शब्दों पर टिके रहेंगे। हमें इन स्टिग्मास को तोड़ने की शुरुआत, सबसे पहले अपने परिवार से करनी पड़ेगी। सोचो कितना अच्छा होगा अगर सभी घरों की महिलाएं बेझिझक इस मुद्दे के बारे में खुल के सबसे बात कर सके।

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