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मेरा लिपस्टिक लगाना मेरे फेमिनिस्ट होने से बिल्कुल ताल्लुक नहीं रखता

Published by
Shilpa Kunwar

“अरे यार, इन लड़कियों को लिपस्टिक लगाने के अलावा और कुछ तो आता नहीं है फिर फेमिनिज्म के लिए लड़ने आ जाती हैं ।” “तू जाकर इंस्टाग्राम पे अपने लिपस्टिक्स के शेड दिखा लोगों को पॉलिटिक्स की बातें तेरे बस की नही।”

जब भी मैं लिपस्टिक की बात करती हूं तब-तब ये लाईन्स मेरे दिमाग में गूंजती हैं जिन्हें मैंने अपने ही दोस्तों के मुंह से अपने ही दोस्तों के लिए सुना था। और आज तक मैं इस बात को समझ नही पाई कि किस तरह उनका लिपस्टिक लगाना या मेकअप करना उनकी ज़रूरी बातों से बढ़कर हो गया।

अक्सर कई लोग फेमिनिज्म का मतलब ठीक से समझें बिना अपने हिसाब से ही महिलाओं को फेमिनिस्ट होने ना होने का टैग देते फिरते हैं। “तुम फेमिनिस्ट हो तो तुम लिपस्टिक क्यों लगती हो?”, “तुम ये छोटे कपड़े और हिल्स पहन कर वुमेन एम्पॉवरमेंट की बात कैसे कर सकती हो?” पता नही इन लोगों को कौन ये बता देता है कि फेमिनिस्ट वही महिलाएं होती हैं जो अपना आई-ब्रो नही बनवाती औऱ अपने अंडरआर्म्स शेव नही करती।

सबसे पहले मैं आपको बताती हूं कि फेमिनिज्म है क्या?

फेमिनिज्म सभी को एक समान हक़ दिलाने की वकालत करता है। जी हां, सभी के हक़ के लिए लड़ना चाहें वो पुरूष हो, महिला हो या ट्रांसजेंडर हो इन सबके लिए डट कर खड़े रहना फेमिनिज्म है। ये आपके ऊपर किसी भी तरह का दबाव नही डालता और यही इसकी खूबसूरती है। इसमें ये ज़रूरी है कि आप अपनी लाईफ अपने अनुसार जिएं, जिस तरह आपका मन करें उस तरह जिएं। जो पहनने का मन करे वो पहनें, जिससे भी प्यार करने का मन करें उससे प्यार करें।

फेमिनिज्म सभी को एक समान हक़ दिलाने की वकालत करता है। जी हां, सभी के हक़ के लिए लड़ना चाहें वो पुरूष हो, महिला हो या ट्रांसजेंडर हो इन सबके लिए डट कर खड़े रहना फेमिनिज्म है।

मैं मेकअप लगा कर, अपने बाल प्रेस करके, अपने अंडरआर्म्स को बिना शेव किए, अपने नेल्स का मेनिक्योर कर के औऱ डार्क लाल लिपस्टिक लगाकर अपने हक़ के लिए, बराबरी के हक़ के लिए लड़ सकती हूं। लिपस्टिक लगाना या मेकअप करना मेरा खुद का चॉइस है, किसी लड़के को पटाना मेरा मकसद नहीं। वैसे भी लड़कों को पटाने के लिए लड़कियां इतनी मेहनत करना पसंद नही करती।

लिपस्टिक का इतिहास के विरोध प्रदर्शन में रहा है अहम रोल

जहां आज के टाईम में लिपस्टिक लगाने वाली लड़कियों को तरह-तरह के जजमेंट दिए जाते हैं वही दूसरी तरफ इतिहास में इसका अहम रोल रहा है। बीसवीं सदी की शुरुआत में लाल लिपस्टिक ने महिलाओं के लिए एक हथियार की जगह ले ली। 1912 में न्यूयॉर्क में, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली महिलाओं ने पूरे शहर और अपने होंठों की लाल रंग से पुताई कर डाली। ब्यूटी बॉस एलिजाबेथ आर्डेन ने अपने हाथों से विरोध प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को लाल लिपस्टिक दिए थे।

80s में लाल लिपस्टिक पूरे दमखम और गौरव के साथ डटी रही। पॉप क्वीन मैडोना ने मैक्स रशियन रेड को अपना पसंदीदा लाल बनाकर नई पहचान दी। इस पूरे दौरान, भारत में, सिर्फ वैंप्स लाल लिपस्टिक लगाती थीं। आखिरकार, अच्छे घर की लड़कियां कोई लाल लिपस्टिक लगाती हैं, है ना?

अगर आप नही जानते तो मैं आपको बता दूं कि लिपस्टिक अब फेमिनिज़्म के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक है

इसमें सबसे बड़ा योगदान साल 2017 में आई फिल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का का है। अपने फेमिनिन बोल्ड मिजाज़ के चलते यह सेंसर बोर्ड की नज़रों में खटक गई और भारी खींचतान के बाद किसी तरह रिलीज हो सकी। खैर, अब बाकायदा हम हर साल 29 जुलाई को ‘लिपस्टिक डे’ भी मनाते हैं। इसके बारे में अच्छे से जानने के लिए आपको गूगल कर ही लेना चाहिए। लिपस्टिक की बदनामी और इससे जुड़े जजमेंट ने इसका पीछा मौजूदा टाईम में भी नहीं छोड़ा है। पर क्योंकि आज हमारे पास हर एक लिपस्टिक के करीब 600 शेड्स हैं तो इन्हें सिर्फ बुर्के के नीचे लगाने के जगह खुलकर लगाइए औऱ अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाइए। आप से ही आएगा बदलाव।

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