“युगों युगों से काव्य का एक धर्म है – अपने शब्दों और भावों से समाज और राष्ट्र को दिशा देना। ये धर्म हर रचनाकार को निभाना चाहिए।” यह कहना है हिंदी की मशहूर कवयित्री निवेदिता चक्रवर्ती का जिन्होंने हिंदी साहित्य की कविताओं के अपने सफर को एक इंटरव्यू के ज़रिये शीदपीपल के साथ शेयर किया।

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1. आपने अपनी सबसे पहली कविता किस उम्र में और किस विषय पर लिखी थी ?

मैंने अपनी पहली कविता साल 1981 में मेरी उम्र के ग्यारहवें साल में लिखी थी । मेरी उम्र के ग्याहरवें साल में लिखी हुई मेरी जो सबसे पहली कविता मेरी डायरी में लिखी हुई है, उसका शीर्षक है -“समय की महत्ता “।

2. कविता लेखन के लिए आपकी सबसे बड़ी प्रेरणा कौन है ?

मुझे  कविता लिखने की प्रतिभा मेरे पिता स्वर्गीय श्री माणिक घोषाल जी से मिली। वे भी बहुत अच्छी कवितायेँ लिखते थे। मैं बचपन से उनके साथ हरिद्वार में काव्य गोष्ठियों में जाती थी। वरिष्ठ कवियों की कविताएं सुनकर मैं बड़ी हुई। मेरी कविताओं के लिए भी मुझे उनसे बहुत मार्गदर्शन और उत्साह मिलता था। मेरे पिताजी मुझे भेंट में सदैव पुस्तकें दिया करते थे। मैं इन महान साहित्यकारों की पुस्तकें पढ़ते हुए बड़ी हुई जैसे पूज्यनीया श्रीमती महादेवी वर्मा, पूज्यनीय – श्री सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय ,श्री रामधारी सिंह दिनकर ,श्री जयशंकर प्रसाद, श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्री माखनलाल चतुर्वेदी आदि। जितना हम पढ़ते और सुनते हैं उतना ही लिखने का हमारा शौंक बढ़ता है।

3. कोरोनावायरस के समय में क्या कविता लेखन तनाव को कम करने में और अपने इमोशंस लोगों तक पहुंचने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है?

कोरोना वायरस की मुश्किल के समय में लेखन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसको दो तरीके से देख सकते हैं, एक तो जो कवि और लेखक होते हैं, वो वैसे भी संवेदनशील होते हैं तो किसी भी परिस्थिति से अधिक प्रभावित होते हैं किन्तु क्योंकि भावों को लिखने की प्रतिभा उनके पास पहले ही होती है तो संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर देते हैं जिससे उनको अपनी निराशाओं को बाहर निकालने हेतु एक मध्यम मिल जाता है। अब एक और केटेगरी है लिसनर्स और रीडर्स केटेगरी जो कि इन सब आशावादी रचनाओं को पढ़कर और सुनकर खुद में आशा जगाती हैं तो लेखन ने इस प्रकार लॉकडाउन के समय में माहौल को खुशनुमा और हल्का बनाने में अपनी पूरी भूमिका निभाई है।

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4.सोशल मीडिया आपकी जर्नी में कैसे भूमिका निभा रहा है ?

कोरोना काल के इन निराशाजनक और डिप्रेशन भरे पलों में सोशल मीडिया ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैंने अपनी साहित्यिक संस्था “अनुगूँज “की स्थापना की और २२ मार्च २०२० को इंडिया की सर्वप्रथम ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन हमारी सँस्था ने किया. इस काव्य गोष्ठी में लगभग 11 कवि और कवयित्रियों ने भाग लिया। हमारी अनुगूँज साहित्यिक सँस्था की दो विशेष बातें हैं जो हमारी सँस्था को अलग पहचान देती है -एक तो ये कि हम तीनों भाषाओँ हिंदी, अँग्रेज़ी और उर्दु के रचनाकारों का स्वागत करते हैं और तीनों ही भाषाओं में अलग -अलग गोष्ठियों का आयोजन करते हैं -हिंदी काव्य गोष्ठी, उर्दू मुशायरा और इंग्लिश पोएट्री सेशन।

दूसरी विशेष बात ये है कि अनुगूँज केवल प्रतिष्ठित कवियों को ही नहीं वरन नवोदित या अच्छा लिखने वाले संकोची कवियों को भी आगे लाने का सतत प्रयत्न कर रहा है। अनुगूँज सब रचनाकारों को अपने पोर्टल पर रचनाएं पोस्ट करने के लिए आमंत्रित करता है और लोग उत्साहपूर्वक अपनी रचनाएं पोस्ट भी करते हैं। एक और विशेष बात ये है कि सब सदस्य एक दूसरे की रचनाओं की प्रशंसा करते हुए सभी को उत्साहित भी करते हैं।

5. क्या आपको लगता है समाज पुरुष कवियों को महिला कवयित्रियों से ज़्यादा महत्व देता है ?

ये एक कड़वी सच्चाई है कि हमारा समाज पुरुष प्रधान है और समाज में कुछ लोग बहुत संकुचित भाव भी रखते हैं जो अच्छी महिला कवयित्रियों को या तो आगे नहीं देते या मंचों पर महिला कवयित्रियों के साथ फूहड़ मज़ाक का सिलसिला शुरू कर देते हैं जो कि बहुत ही गलत स्थिति है। समाज में प्रतिभा का स्थान होना चाहिए, प्रतिभा लिंग विशेष पर निर्भर नहीं करती, हमे ये समझना पड़ेगा। एक दूसरा पहलू भी है कि बहुत सी स्त्रियों ने संकोच पूर्वक या परिवार की गृहस्थी सँभालते हुए अपनी प्रतिभाओं को अपनी डायरी और बक्सों में स्वेच्छा से समेट दिया, आवश्यकता है कि उन डायरी में छुपे हुए साहित्य के सुमनों की सुगंधि को बिखेर दिया जाये तब देखिये आपको महिलाओं की प्रचुर मात्रा में प्रतिभाएं देखने को मिलेंगी।

6.समाज में बदलाव लाने के लिए कविताओं की क्या भूमिका है ?

काव्य की आत्मा रस है। कवितायेँ विभिन्न रसों में लिखी जा सकतीं हैं – श्रृंगार, हास्य, शांत, करुण, रौद्र, वीर, अद्भुत, वीभत्स, भयानक,भक्ति आदि। कविता विभिन्न रूपों में भी लिखी जाती है जैसे हिंदी भाषा में गद्यगीत ,दोहा ,चौपाई ,मुक्तक ,कुण्डलियाँ, घनाक्षरी आदि ,ऐसे ही उर्दू में ग़ज़ल,नज़्म,क़ता आदि ,अंग्रेज़ी में सॉनेट ,फ्री वर्स ,हाइकू ,राइम आदि।

कोई भी रस हो या कविता का कोई भी रूप हो, संदेश छुपा होना चाहिये। समाज की विसंगतियों, मानवीय चेतना का पतन, व्यवस्थाओं की दुर्दशा, इस तरह के विषयों पर यदि कविता न लिखी जाये, समाज को न झिंझोड़ा जाये, मनुष्य की चेतना को जागृत न किया जाये तो कवि या कवयित्री समाज देश और सम्पूर्ण मानव जाति के लिए न तो अपना कवि धर्म पूरा कर रहे हैं न ही जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं।

युगों युगों से काव्य का एक धर्म है -अपने शब्दों और भावों से समाज और राष्ट्र को दिशा देना। ये धर्म हर रचनाकार को निभाना चाहिए।

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