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क्या आप सावित्रीबाई फुले के बारे में ये ज़रूरी बातें जानते हैं ?

Published by
Garima Singh

आजकल देश में लगातार हो रहे नारीवादी(फेमिनिज्म) और equality की सोच की नींव सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिबा फुले ने मिलकर डाली थी। दोनों ने समाज में हो रहे अत्याचार और भेदभाव को पहचाना, उनका विरोध किया और हम सबके लिये भेदभाव के खिलाफ एक आवाज़ बन गए।  

19वीं सदी में भारतीय महिलाओं की स्थिति बहुत बुरी थीं। एक ओर महिलाएं Patriarchy में फंसी थीं, तो दूसरी ओर समाज की रूढ़िवादी (conservative) सोच के कारण तरह-तरह के अत्याचार सहने पड़ते थे जैसे की सतीप्रथा, बाल विवाह (Child Marriage), दहेज प्रथा आदि।हालात इतने ज्यादा खराब थे कि महिलाओं का स्वाभिमान पूरी तरह से खत्म हो चुका था और उनके साथ किये जा रहे गलत बर्ताव को वे अपनी किस्मत मान चुकी थीं।

 ऐसे समय में सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं को सामाजिक शोषण (social exploitation) से मुक्त करने और उनके लिए शिक्षा के अधिकार को लेकर बहुत प्रयास किया। सावित्रीबाई फूले ने भारत के सामाजिक सुधार आंदोलन (social revolution) में बहुत अहम रोल निभाया है।

सावित्रीबाई फुले का बचपन

सावित्रीबाई फुले का जन्म  3 जनवरी, 1831 को हुआ था। उस वक़्त भारत में Child Marriage का बहुत चलन था जिसकी वजह से उनकी 9 साल की छोटी सी उम्र में ही शादी हो गई, 13 साल के ज्योतिराव फूले के साथ। सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने मिलकर पुणे में लड़कियों के लिये देश के सबसे पहले गर्ल्स स्कूल को बनाया।

पिता के विरोध के बावजूद पढ़ाई की

मात्र 9 साल की उम्र में सावित्रीबाई फूले का शादी हुई और तब वह अनपढ़ थीं। उनके पति ज्योतिबा फुले भी तीसरी क्लास तक ही पढ़े थे। जिस समय में सावित्रीबाई पढ़ने का सपना देख रही थीं उस दौर में छुआछूत, भेदभाव जैसी कई समस्या थी। उसी दौरान एक दिन सावित्री अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं, तभी उनके पिताजी ने देख लिया. वह दौड़कर आए और उनके हाथ से किताब छीनकर घर से बाहर फेंक दी जिसका कारण सिर्फ़ इतना था कि शिक्षा का हक़ केवल उंचे जाति के पुरुषों को ही था। 

दलित और महिलाओं के लिए शिक्षा पाना पाप माना जाता था।बस उसी दिन से वह किताब वापस लाकर सोच लिया की कुछ भी हो जाए वह एक न एक दिन पढ़ना जरूर सीखेंगी। इसी लगन से उन्होंने एक दिन ख़ुद पढ़कर अपने पति ज्योतिबा राव फूले के साथ मिलकर social reformation का कदम उठाया।

ज्योतिराव फूले ने सावित्रीबाई को पढ़ना सिखाया

कहा जाए तो ज्योतिराव फुले देश के पहले फेमिनिश्ट थे। उन्होनें सावित्रीबाई को पढ़ना सिखाया जिससे वह अपने पैरों पर खड़ी हो पाई और दोनों ने मिलकर कितनी ही लड़कियों और दलितों के शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी।

भारत की पहली महिला टीचर बनीं

सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने मिलकर देश के सबसे पहले गर्ल्स स्कूल को बनाया था और कुल 18 स्कूल का निर्माण किया था।सावित्रीबाई भारत के पहले बालिका विद्यालय (Girls School) की पहली प्रिंसिपल बनी। उस वक़्त इस स्कूल का बहुत ज्यादा विरोध किया गया, उनपर रास्ते में आते जाते कीचड़ उछाले जाते थे।

सावित्रीबाई स्कूल जाती थीं, तो लोग पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। गोबर फेंकने वाले लोगों का मानना था कि शूद्र-अतिशूद्रों(Scheduled caste) को पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है। सावित्रीबाई ने उस दौर में लड़कियों के लिए स्कूल खोला जब लड़कियों को पढ़ने-लिखने का अधिकार ही नहीं था। उस वक़्त लड़कियां सिर्फ घर के कामकाज तक ही सिमटकर रह जाती थी, उनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं थीं।

महिलाओं की मजबूत आवाज़ बनीं

कहा जाए तो सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फूले देश के पहले feminist थे। उन्होंने समाज के बहुत सारे भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी।सावित्रीबाई ने 19वीं सदी में छुआ-छूत(Untouchability) सतीप्रथा, बाल-विवाह (Child marriage) और विधवा विवाह निषेध (denying widow remarriage) जैसी प्रॉब्लम्स के खिलाफ अपने पति के साथ मिलकर काम किया। 

एक बार सावित्रीबाई ने शर्म से आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा महिला काशीबाई की अपने घर में डिलीवरी करवाई और उसके बच्चे ‘यशंवत’ को अपने बेटे के रूप में गोद लिया था। उनका पूरा जीवन समाज के खिलाफ महिलाओं और दलितों के अधिकारों के स्ट्रगल में बीता। उनकी एक बहुत ही famous कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने- लिखने और social reformation की बात करती है।

1848 में सावित्रीबाई अकेले ही भारत की करोड़ों औरतों के लिए मिशाल बन गई थीं।

पहले महिला सेवा मंडल का निर्माण किया

सावित्रीबाई फुले ने पहला गर्ल्स स्कूल नहीं खोला, पहली अध्यापिका नहीं बनीं बल्कि भारत में औरतों की पहली आवाज़ बनीं। उन्होंने भारत की मरी हुई और मार दी गई औरतों को दोबारा से जन्म दिया। मर्दों का समाज पुणे की विधवा औरतों को प्रेग्नेंट कर suicide के लिए छोड़ जाता था। सावित्रीबाई फूले ने ऐसी विधवाओं के लिये बहुत कुछ किया।

1892 में उन्होंने महिला सेवा मंडल के रूप में पुणे की विधवा महिलाओं की आज़ादी  के लिए देश का पहला महिला संगठन बनाया। इस संगठन में हर 15 दिनों में सावित्रीबाई खुद सभी गरीब, दलित और विधवा महिलाओं से चर्चा करतीं, उनकी प्रॉब्लम्स को सुनतीं और उसे दूर करने का उपाय भी सोचतीं। वहां सभी बेसहारा प्रेग्नेंट औरतों को बगैर किसी सवाल पूछे उनकी देखभाल की जाती उनकी डिलीवरी कर बच्चों के पालन पोषण के लिए एक सेफ़ जगह दी जाती।

“यह समस्या उस वक़्त इतनी बड़ी थी की इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ 4 सालों के अंदर ही 100 से ज्यादा विधवा औरतों ने इस जगह बच्चों को जन्म दिया।

सत्यशोधक समाज की स्थापना की

सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। उन्होंने विधवा विवाह(Widow Remarriage) की शुरूआत की और सत्यशोधक समाज में पहली बार बिना दहेज(Dowry) के विधवा विवाह कराया गया। 1890 को बीमारी के चलते ज्योतिबा फुले की मृत्यु हो गई थी। ज्योतिबा की मौत के बाद सत्यशोधक समाज की जिम्मेदारी सावित्रीबाई फूले पर आ गई। उन्होंने इस जिम्मेदारी को बेहद अच्छी तरह निभाई।

जब प्लेग (plague) पुणे में फैल गया था

1897 में प्लेग की भयंकर महामारी(Pandemic) फैल गई। पुणे के कई लोग रोज इस बीमारी से मरने लगे। तब सावित्रीबाई ने अपने बेटे यशवंत को आने को कहा और उन्होंने उसकी मदद से एक हॉस्पिटल खुलवाया। उस मुश्किल समय में सावित्रीबाई खुद बीमारों के पास जाती और उन्हें इलाज के लिए अपने साथ हॉस्पिटल  लेकर आती। यह जानते हुए भी यह एक संक्रामक बीमारी(communicable disease) है, फिर भी उन्होंने बीमारों की देखभाल करने में कोई कमी नहीं रखी।

एक दिन जैसे ही उन्हें पता चला कि गांव में एक बच्चे को प्लेग हुआ है तो वह वहां गई और बीमार बच्चे को पीठ पर लादकर अस्पताल लेकर आयी। इस वजह में यह बीमारी उनको भी लग गई और 10 मार्च, 1897 को उनकी मौत हो गई।

सावित्रीबाई थिंकर के साथ साथ एक पोएट भी थी

सावित्रीबाई एक poetess भी थीं। उन्हें मॉडर्न मराठी काव्य की pioneer भी माना जाता है। वे अपनी कविताओं और आर्टीकल में हमेशा सामाजिक चेतना (social awakening) की बात करती थीं की कैसे हम सोसाइटी में चेंज ला सकते हैं। 

उनकी एक मराठी कविता की हिंदी में लाइन्स हैं- ‘ज्ञान के बिना सब खो जाता है, ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते हैं इसलिए, खाली ना बैठो, जाओ, जाकर शिक्षा लो।’ उन्होनें अपना पूरा जीवन समाज के दबे हुए लोग खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ते हुए बिताई, मगर सच्चाई तो ये है की जो भेदभाव और inequality के खिलाफ लड़ाई उन्होंने शुरु की थी वो आज भी चल रही है। महिलाओं को उनका हक़ मिलना आज भी बाकी है लेकिन अगर हम ठान लें की इन चीज़ों को बदलना है, अपने सोच में बदलाव लाना है तो सोसाइटी में चेंज जरूर आएगा।

सावित्रीबाई फुले के बारे में यह सारी बातें हर किसी को पता होनी चाहिए। उनके बारे में बहुत कम ही लिखा गया है। ऐसी लीडर के सोच को हमें अपनी लाइफ में जहां तक हो सके शामिल जरुर करना चाहिए, ताकि वे सिर्फ जयंती (Birth Anniversary) में ही याद कर भुला ना दिए जाएं।

पढ़िए : फूलन देवी: एक ऐसी महिला जिसने अपने रेपिस्ट्स को खुद गोली से मार डाला

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