Is Trust Gendered? क्यों जेंडर के हिसाब से विश्वास अलग अलग होता है?

Is Trust Gendered? क्यों जेंडर के हिसाब से विश्वास अलग अलग होता है? Is Trust Gendered? क्यों जेंडर के हिसाब से विश्वास अलग अलग होता है?

Swati Bundela

23 May 2022

विश्वास रिश्तों की नींव है। कोई भी रिश्ता तब तक नहीं पनप सकता जब तक उसमें विश्वास न हो। लेकिन क्या विश्वास भी एक जेंडरड कांसेप्ट है? क्या एक जेंडर को विश्वास से लाभ होता है जबकि दूसरा ओप्रेस होता है? दुर्भाग्य से हाँ। हमारे समाज में, महिलाओं के खिलाफ उनकी स्वतंत्रता को रेस्ट्रिक्ट करने के लिए ट्रस्ट या विश्वास का प्रयोग किया जाता है। औरतों के लिए विश्वास एक बहुत ही पतला धागा होता है जिसे आसानी से तोड़ा जा सकता है। पर पुरुषों पर बाई डिफ़ॉल्ट भरोसा किया जाता है। उनके गलत होने पर भी उनपर भरोसा किया जाता है। माता-पिता बेटियों के प्रति ज़्यादा संदिग्ध होते हैं। लड़कियों का लोकेशन ट्रैक करना, उनके दोस्तों के बारे में जानकारी ढूंढ़ने की कोशिश करना, उनके कपड़ों के चॉइस के लिए उन्हें शर्मिंदा करना और उनके निर्णयों को स्वीकार न करना यह सब साबित करता है कि माता-पिता को अपनी बेटियों पर भरोसा नहीं कर पते हैं। वे मानते हैं कि बेटियों को आसानी से मनुपिलेट की जा सकती है या परिवार की इज़्ज़त को हानि पहुंच सकती है। दूसरी ओर, बेटो पर ऐसी भरोसे की कमी नहीं दिखाई देती है। माता पिता सरलता से मान लेते हैं की उनका बेटा ‘राजा बेटा’ है। विवाहित जीवन में भी, ये असमानता मौजूद है। पत्नियों से हमेशा अपने पतियों पर आँख बंद करके भरोसा करने की अपेक्षा की जाती है, जबकि पति हर बार अपनी पत्नियों के चरित्र पर संदेह करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। यहाँ तक की कई माता पिता सोचते हैं की अगर पति का कोई गैर संबंध हॉट, तो वह भी पत्नी के दोषों के कारण है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि समाज के लिए परिवार की इज्जत महिला के शरीर में होती है। अगर लड़की छोटे कपडे पहन ले, तो इज़्ज़त बर्बाद हो जाती है। यहाँ तक की, समाज को लड़की की सुरक्षा, ख़ुशी और इज़्ज़त से ज़्यादा परिवार की इज़्ज़त प्यारी है। इसी कारण से स्त्री जाती पर इतने रोक टोक लगाए जाते हैं। कोई भी रिश्ता एक महिला की स्वतंत्रता को कम करने पर निर्भर क्यों होना चाहिए? समाज एक महिला के विवेक पर भरोसा क्यों नहीं करता? अगर महिलाओं पर भरोसा नहीं किया गया तो क्या उन्हें कभी अहम जिम्मेदारी दी जाएगी? इसलिए एक महिला के हर कदम पर संदेह करने के जगह, परिवारों को उस पर विश्वास करना शुरू करना चाहिए। माता-पिता को अपनी बेटियों को गलतियाँ करने और उनसे सीखने की आज़ादी देना चाहिए और साथ ही सही निर्णय लेना सिखाना चाहिए।पतियों को अपनी पत्नियों की भावनाओं पर भरोसा करना चाहिए। इतना तो साफ़ है की बिना पारिवारिक स्पोर्ट के आगे बढ़ना किसी के लिए भी मुश्किल है। नामुमकिन नहीं, मगर कठिन ज़रूर है। हमें ऐसे कहावते बंद करना चाहिए जैसे की “औरत ही परिवार को जोड़ भी सकती है तोड़ भी सकती है”। नहीं, कम्पेटिबिलिटी का होना या न होना परिवार को जोड़ता है या तोड़ता है। प्यार परिवार को जोड़ता है। एक दूसरे पर विश्वास परिवार को जोड़ता है। एक दुसरे का मुश्किल वक्त में साथ निभाना परिवार को जोड़ता है।

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