आपने कभी किसी ना किसी को ये कहते हुए तो सुना ही होगा कि “आज़ के टाईम में ऐसा कुछ नही है जो लड़कियां नही कर सकती।” अगर करियर में तरक्की करने के रूप में देखा जाएं तो ये बात तो 100 टका सच है। ऐसा कोई फील्ड नही जहां लड़कियों ने अपना परचम ना लहराया हो। लेकिन, एक फील्ड ऐसा है जहां लड़कियां अगर अपना परचम लहराना भी चाहें तो उन्हें सोसायटी के तरफ से बद्दचलन, बदतमीज़ और ना जानें क्या-क्या टैग दे दिया जाता है। और वो फील्ड है लड़कियों का अपने सेक्शुअल डिजायर पर खुल कर बात करना, शेयर करना और सेक्स करने की बात करना या मन बनाना।

सेक्शुअल डिजायर रखने वाली लड़की असंस्कारी क्यों?

जैसा कि हम सब जानते हैं कि आज भी काफी लोगों द्वारा लड़कियों के संस्कार और उसकी प्योरिटी का प्रमाण उसके रहन-सहन और बात करने के तौर-तरीकों पर दिया जाता हैै। ऐसे में अगर कोई लड़की अपनी सेक्शुअल फीलिंग्स शेयर करती है या उस पर बात करती है तो उसके करेक्टर पर लोग अपनी बेबुनियाद राय रखने ही लगते है। लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये कैसे लोग हैं जो जेंडर के आधार पर तय करते हैं कि कौन-सी बात किसे करनी चाहिए और किसे नही। अगर यही लोग लड़को का सेक्शुअल डिजायर पर बात करना आसानी से एक्सेप्ट कर लेते हैं तो लड़कियों पर संस्कारों का बोझ क्यों? कैसे लड़को का सेक्स और उससे जुड़ी बातों पर बात करना उनके करेक्टर पर कोई सवाल नही उठाता लेकिन लड़कियों को गंदी लड़की का करेक्टर सर्टिफिकेट दे दिया जाता है?

कैसे लड़को का सेक्स और उससे जुड़ी बातों पर बात करना उनके करेक्टर पर कोई सवाल नही उठाता लेकिन लड़कियों को गंदी लड़की का करेक्टर सर्टिफिकेट दे दिया जाता है?

इस बात को और अच्छे से समझाने के लिए मेरे पास कुछ प्रूफ भी है। रीयल लाईफ में लड़कियों की सेक्शुअल एक्टिविटी की बात तो दूर, हमारे देश के लोग रील लाईफ की हिरोईनों की सेक्शुअल एक्टिविटी या सेक्स पर बात करना भी बिल्कुल एक्सेप्ट नही कर पातें। चाहें वो लस्ट स्टोरीज़ की कियारा आडवाणी हो जो खुद को सेक्स टॉय से सटिस्फाई करती दिखती है या लिपस्टिक अंडर माई बुरखा की उषा परमार जो चोरी-छिपे सेक्स और रोमांस की किताबें पढ़ती हुई दिखाई देती है, इन सब पर हमारे समाज के पितृसत्तात्मक पुरूषों की सांसे फूलती हुई दिखाई दी। ये होना भी था। इस सोसायटी के आधे से ज्यादा मर्दों को ये लगता है कि वो इकलौते ऐसे व्यक्ति है जो महिलाओं के सेक्स की ज़रूरत पूरी कर सकते हैं और उन्हें सटिस्फाई कर सकते हैं। औरतों का इस तरह से खुद की सेक्शुअल डिजायर को पूरा करते देख वो खुद को हेल्पलेस पाते हुए महसूस हुएं।

हमारे समाज़ के लोग कुछ सेक्टर्स में तो आगे बढ़ रहे  हैं लेकिन महिलाओं के मामले में वो काफी पिछड़े हुए हैं। ज़रूरत है कि आगे आने वाली जेनरेशन लड़को के साथ-साथ लड़कियों के फीलिंग्स और ज़रूरतों को भी एहमियत दें। एक ऐसा माहौल क्रिएट करें जिसमें महिलाएं खुद को हर तरीके से आजाद समझें फिजिकली, मेंटली और इमोशनली

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