पेरेंट्स को अक्सर ये नहीं पता चलता कि हमारे बच्चे किसी psychologic समस्या से जूझ रहे है |और जैसे जैसे वो बड़े होने लगते है हम उन्हें गलत समझने लगते है |जैसे की आज कल बच्चों के बीच बिहेवियर इश्यू सबसे बड़ी psychologic समस्या बन गई है। ऐसी बहुत सी psychologic समस्याएं है, जिन्हें अगर हम जान लें तो उससे हम अपने बच्चे को सही समय पर बचा सकते है |बच्चों से जुड़ी मनोवैज्ञानिक समस्या

बच्चों से जुड़ी मनोवैज्ञानिक समस्या के होने के 6 सीरियस sign

अब जो हम आपको जिन 6 संकेतों ( sign )के बारे में बताने जा रहे हैं उनके बारे में एक माता-पिता होने के नाते आपको जानना जरूरी है। अगर आप अपने बच्चे के अंदर इन संकेतों में से किसी एक को या फिर इससे ज्यादा नोटिस कर रहे हैं तो आपको अलर्ट हो जाना चाहिए और किसी अच्छे साइकेट्रिस्ट से सलाह जरूर लेनी चाहिए।

  • बच्चों का एग्रेसिव होना -बच्चों के लिए एग्रेसिव बिहेवियर उनकी इच्छापूर्ति का साधन होता है। उनमें पेशेंस की कमी होती है। बच्चे को अपने  क्रोध गुस्से पर कण्ट्रोल करना सिखाये और बिहेवियर उन्हें अपने इमोशंस शब्दों से बया करने को कहे नाकि फिजिकल विओलेन्स से। बच्चे से पेशेंस से बात करें और उसके एब्नार्मल बिहेवियर के कारणों को जानने की कोशिश करें। हो सकता है वो ख़ुद को Unsafe एक्सपीरियंस कर रहा हो, आपका प्यार-दुलार उसकी मानसिक पीड़ा को शांत करेगा।
  • हर चीज के लिए ज़िद करना– बच्चों को अपनी परिस्थिति से अवेयर कराएं |उन्हें मॉरल वैल्यू के बारे में शुरू से समझाएं, क्योंकि इसी से अच्छे पर्सनालिटी बनती है | जब बच्चे बहुत छोटे होते हैं तब शौक़ और ख़ुशी के चलते हम उनकी हर सही-ग़लत मांग पूरी करते जाते है।. इसलिए थोड़े बड़े होने पर वे अपनी बात को मनवाने के लिए जिद का सहारा लेने लगते हैं।
  • बात -बात पर झूठ बोलना — बच्चे के टीचर्स से मिलकर उसके झूठ बोलने की आदत के बारे में बात करें । कहीं पैरेंट्स या टीचर्स की सख़्ती और मार के डर से तो बच्चा झूठ नहीं बोल रहा। बच्चे के झूठ बोलने पर सज़ा देने की बजाय प्यार से बोलने के कारणों के बारे में जानने की कोशिश करें। यदि आप बच्चों को ओपन और हेअल्थी एनवायरनमेंट देंगे, तो बच्चे शायद ही झूठ बोलें।
  • डरपोक और दब्बू होना– अक्सर हम बचपन में बच्चों को भूत-अंधेरे आदि का डर दिखाते  हैं। ये सभी बातें उनके अंतर्मन में कहीं न कहीं गहराई तक पैठ जाती हैं, वे नहीं जानते कि ऐसा करके जाने-अनजाने में वे अपने बच्चे का आत्मविश्‍वास कमज़ोर कर रहे हैं। ऐसा न करें, बेहतर होगा कि आप बच्चों के साथ एडवेंचर्स से भरपूर गेम्स खेलें। बहादुर और इंस्पिरेशन महान लोगों के क़िस्से-कहानियां सुनाएं, यदि ज़रूरत हो, तो पर्सनैलिटी इम्प्रूवमेंट क्लास या फिर काउंसलर की मदद लेने से भी न हिचकें।
  • पढाई से जुड़ी समस्याएं– पढ़ाई को लेकर बच्चों को होने वाली समस्याओं, जैसे- तनाव, डर, असफलता की ग्लानि/आत्महत्या की प्रवृत्ति आदि को देखते हुए सरकारी शिक्षा नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन किए गए लेकिन इसके बावजूद छह से बारह साल तक के बच्चों की पढ़ाई को लेकर कुछ मानसिक समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं, ख़ासतौर पर अपने पैरेंट्स और टीचर्स की अपेक्षाओं को पूरा करने की कशमकश।
  • ऑटिज़्म बीमारी — ऑटिज़्म बीमारी भी दिमाग़ी तंत्र से जुड़ी है इससे ग्रस्त बच्चे का संवेदी तंत्र अव्यवस्थित होता है, जिससे वो सामान्य बच्चों की तरह नहीं रहता।. इन बच्चों को भी विशेष देखभाल, प्यार और प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है। एसपर्जर, यह ऑटिज़्म का ही माइनर प्रॉब्लम है ,इसमें बच्चा आई कॉन्टेक्ट कम रखता है, कम बोलता व सुनता है, केवल हां-ना में ही अधिक बात करता है। कभी-कभी तो ज़िंदगीभर इसका पता ही नहीं चलता है, जिसकी वजह से पैरेंट्स कोई ट्रीटमेंट भी नहीं करवा पाते हैं लेकिन समय रहते मालूम होने पर इसका इलाज संभव है फिर भी इस समस्या को बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं।
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