एक महिला की दो ओवरीज़ / अंडाशय होती हैं। इन ओवरीज़ में छोटे छोटे अंडे होते हैं जो पीरियड के शुरू होते ही बढ़ना चालू हो जाते हैं। इन दोनों ओवरीज़ मेसे कोई एक ओवरी का अंडा बड़ा हो कर ओवरी से बाहर निकल जाता है। इस प्रक्रिया को ही ओव्यूलेशन कहते हैं।

आप कुछ शारीरिक बदलावों से समझ सकते हैं कि आप ओव्युलेट हो रहे हैं-

1.  पेट दर्द

जब आपको आपके पेट के नीचे के हिस्से में थोड़ा दर्द हो और कभी कभी उसके साथ में पैर में भी थोड़ा दर्द हो वो भी एक तरफ।

2. ब्रैस्ट

ओव्युलेट होने के वक़्त ब्रैस्ट भरा हुआ हो जाता है उस में दर्द होने लगता है और टच करने में काफी नाज़ुक हो जाते हैं।

3. सेक्स की इक्षा

ओव्युलेट होने के वक़्त आपकी सेक्स की इक्षा सामान्य दिनों से ज्यादा होती है।

4. BBT के ज़रिये

ये एक मशीन होती है जिस से आप आपके शरीर का तापमान नापते हैं। यह वो तापमान होता है जो जब आप सोकर उठते हैं उस वक़्त होता है बिना ब्रश किये या बिस्तर से बाहर
निकलें। ओव्युलेट होने के समय आपके तापमान में 0.5 से 1 डिग्री ज्यादा आती है।

5. सफ़ेद पानी के जरिए

सफ़ेद पानी कि प्रक्रिया आपके पीरियड साइकिल के हिसाब से बदलती रहती है। जैसे कि पीरियड्स के बाद आपको बहुत कम या बिलकुल भी सफ़ेद पानी नहीं आता है। कुछ दिनों बाद थोड़ा चिपचिपा सा होता है। जब यह चिपचिपा होता है उस वक़्त आपके एक ओवरी के बहुत से अंडो में से एक अंडा आकर में बढ़ रहा होता है। जब आपके सफ़ेद पानी एकदम साफ़ और पतला हो जाता है उस वक़्त आप सबसे ज्यादा प्रेग्नेंट होने के समय में होते हैं।

प्रेग्नेंट होने की प्रक्रिया में जरुरी होता है कि हस्बैंड और वाइफ यानि पति-पत्नी बराबरी से अपना रोल निभाएं। प्रेग्नेंट ना होने में किसी की गलती नहीं होती और इसका किसी को दोष नहीं दिया जा सकता। क्योंकि प्रेगनेंसी एक शारीरिक सिस्टम के सही होने से होती है जो कि जरुरी नहीं इंसानों के हाँथ में हमेशा हो।

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