मद्रास हाई कोर्ट ने मंगलवार को घोषित किया कि दुल्हन की आत्महत्या के मामलों में ससुराल वालों को नहीं छोड़ा जा सकता है। सिर्फ इसलिए कि वे महिला के साथ नहीं रहते थे। एक नवविवाहित वर के माता-पिता पर लोअर अदालत द्वारा लगाए गए जेल अवधि को ससपेंड करने से इनकार कर दिया था।

“चूंकि ससुराल वाले अपने बेटे और पीड़ित महिला के साथ नहीं रह रहे हैं और वे उस आधार पर सजा को ससपेंड कराने की मांग कर रहे हैं … जिसका फायदा उठाते हुए, समाज में एक गलत संदेश गया है कि माता-पिता आसानी से अपने दायित्व से बच सकते हैं जो कि कथित अपराध की श्रेणी में आता है” जस्टिस पी. वेलमुरुगन ने कहा।

इसके अलावा, मद्रास उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि माता-पिता को अपने बच्चों को भोजन, आश्रय और कपड़े प्रदान करना बंद नहीं करना चाहिए और ना ही उन्हें अपने बल पर नौकरी पाने का आग्रह करना चाहिए।

न्यायाधीश ने यह भी कहा कि माता-पिता की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि उनके बच्चे जिम्मेदार नागरिक बनें। ऐसे ही एक संबंधित प्रकरण में न्यायाधीश ने एक व्यक्ति के माता-पिता की क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन को खारिज कर दिया, जिसे दहेज उत्पीड़न मामले में दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। मामले के अनुसार उनकी बहू ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी।

मद्रास उच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि ससुराल वाले यह दावा करने से बच जाते हैं कि वे अपने बेटों के साथ नहीं रहते।

मद्रास उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि यह देखा गया है कि जब बाद में दहेज माँगने जैसी घटनायें होती हैं तो उत्पीड़न के कारण महिलाओं के आत्महत्या की घटनायें बढ़ती हैं। यह भी कहा गया कि ससुराल वाले यह कहकर सजा से बच रहे थे कि वे अपने बेटे के साथ नहीं रह रहे थे।

देखा गया है कि ससुराल वाले अपने बेटों को दुल्हन से दहेज निकालने के लिए उकसाने का काम किया जाता है। यह दहेज गहने, पैसे, वाहन और अन्य बहुत कुछ के रूप में हो सकता है।

न्यायाधीश ने कहा, “दोषी द्वारा किए गए अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए, यह अदालत उक्त प्रकरण को सस्पेंड करने के लिए इच्छुक नहीं है,” न्यायाधीश ने कहा।

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