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वो 5 बड़े काम जो अंबेडकर को नारीवादी बनाते हैं

Published by
Sakshi

अंबेडकर का नाम आते ही ज़हन में एक जोशीले क्रांतिकारी व्यक्ति की तस्वीर बन जाती है, जिसने जाति के नाम पर होने वाले भेद भाव के खिलाफ़ सारी ज़िंदगी लड़ाई लड़ी और अंत में समानता के वेल्यू पर आधारित देश का संविधान तक रच डाला। पर अंबेडकर के योगदान केवल यहीं तक सीमित नहीं है। इन्होंने महिला अधिकारों की भी पैरवी की है। ये कहते हैं कि “मैं किसी कंम्युनिटी की प्रगति, उसकी महिलाओं की प्रगति के आधार पर देखता हूँ”। इन्होंने महिलाओं को जाति, धर्म और लिंग के बंधनों को तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। अंबेडकर ने महिलाओं को लेकर अपनी रेडिकल विचारधारा से उस समय के सभी विचारकों को चकित कर डाला। सबसे ज़रूरी बात ये है कि इन्होंने अपनी विचारधारा को बातों में नहीं रखा, उसे ज़मीनी स्तर पर लाने की पूरी कोशिश की। आइये जानते हैं नारीवाद और अम्बेडकर के कनेक्शन को।

वो 5 बड़े काम जो अंबेडकर को नारीवादी बनाती हैं (नारीवाद और अम्बेडकर)-

1. इन्होंने महिलाओं को मैटरनिटी बेनिफ़िट देने की वकालत की

अंबेडकर देश में महिलाओं के लिए मातृत्व लाभ को पहचानने, वकालत करने और प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति थे। 1929 में अंबेडकर के प्रयास से बॉम्बे लेजिस्लेचर महिला कारखाने के वर्कर्स के लिए मातृत्व लाभ(maternity benefit) को शामिल करने वाला पहला लेजिस्लेचर बन गया।

इस विषय पर वे कहते हैं कि “मेरा मानना ​​है कि यह राष्ट्र के हित में है कि माँ को प्रसव पूर्व(pre natal) अवधि के दौरान और बाद में भी एक निश्चित मात्रा में आराम मिलना चाहिए। हर देश में, इसलिए, जहां मातृत्व लाभ की पॉलिसी लाई गयी है, आप पाएंगे कि सरकार मातृत्व लाभ के संबंध में एक निश्चित राशि भी प्रदान करती है “

2. इन्होंने हिंदू धार्मिक ग्रंथों की कड़ी निंदा की

1927 की महार क्रांति में अंबेडकर ने ‘मनुस्मृति’ का दहन किया था। उन्होंने कहा कि “आइए प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों की ऑथोरिटी को नष्ट करें जो असमानता में पैदा हुए हैं। धर्म और ग़ुलामी एक साथ नहीं चल सकते हैं।” हिंदू धार्मिक ग्रंथ जातिवाद और पितृसत्ता का गढ़ हैं। इन्ही किताबों के दम पे महिलाओं के शोषण को जुस्टिफ़ाय किया जाता है। अंबेडकर ताउम्र इन ग्रंथों के खिलाफ़ खड़े रहे। उनके शब्द थे कि “संस्कारों के नाम पर, हिंदू महिलाओं को अंधविश्वास के बंधन से जोड़ा जाता है, जिसे वे अपनी मृत्यु तक निभाती हैं।”

3. इन्होंने ‘स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा’ के मूल्यों को भारतीय संविधान में शामिल किया

अंबेडकर ने संविधान में सभी को समान अधिकार दिये। लिंग और जाति के आधार पर सदियों से चले आ रहे भेद भाव को इन्होंने एक बार में संविधानिक रूप से मिटा दिया। इनके लिए ‘स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा’ सबसे अहम मूल्य थे इनके मुताबिक केवल संविधान में नहीं लोगों के सामाजिक जीवन में भी होने चाहिए। उनका कथन था कि “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं रह सकता है जब तक कि वह सामाजिक लोकतंत्र का आधार न हो।” सामाजिक लोकतंत्र जीवन जीने का एक तरीका है, जो जीवन की प्रमुखता के रूप में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे को पहचानता है।

4. हिंदू कोड बिल पेश किया

अम्बेडकर द्वारा स्वतंत्र भारत के कानून मंत्री के रूप में पेश किए गए हिंदू कोड बिल में लैंगिक समानता के पक्ष में और जाति आधारित समाज के खिलाफ उनके विचार दिखते हैं। हिंदू कोड द्वारा पहली बार महिलाओं को तलाक देने का अधिकार, बेटियों को विरासत का अधिकार और विधवाओं को समान संपत्ति के अधिकार देने की बात उठी। तमाम हिंदूवादी संगठन अंबेडकर के खिलाफ़ हो उठे थे पर वे अंबेडकर को रोक न सके। अंत में जब हिंदू कोड बिल पास नहीं हो सका तो अंबेडकर ने विरोध में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

5. इन्होंने महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया

वे कहते हैं कि “महिलाओं की संगत के बिना एकता निरर्थक है। शिक्षित महिलाओं के बिना शिक्षा बेकार है और महिलाओं की ताकत के बिना आंदोलन अधूरा है।” इनका मानना कि महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता तभी मिलेगी जब वे पढ़ी-लिखी होंगी इसलिए अंबेडकर चाहते थे कि महिलाओं को भी पुरुषों के साथ पढ़ाया जाए। इसके अलावा इन्होंने ‘ मूकनायक’ और ‘बहिस्कृत भारत’ के नाम से दो अखबार चलाये जिसमें मुख्य रूप से महिलाओं के मुद्दे कवर किये जाते थे।

इन्ही कामों ने नारीवाद और अम्बेडकर के कनेक्शन को और मज़बूत किया।

पढ़िये:  जानिए भारत की 10 महिला स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में

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