परिवार, ये शब्द सुनते ही दिमाग में वो नज़र वो लोग आते हैं, जो दिल के बहुत करीब हो। अब दिल के करीब कौन होगा, ये तो हम ही तय करेंगे ।

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इश्क़ पर जोर नहीं है, ये वो आतिश ‘ग़ालिब’।
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।।

आज हमें समाज की पुरानी डेफिनिशन में बंधने की ज़रूरत नहीं है। परिवार के बारे में हमारी समझ को थोड़ा बदलने की ज़रूरत है, ताकि उसमें हम सभी के डाइवर्स परिवार फिट हो सकें। हस्ता खेलता परिवार कोई भी हो सकता है, दोस्त-यार, रोमेंटिक पार्टनर और आप अकेले भी।

मैं अपना ही परिवार हूं।

अकेले रहना अकेलेपन में रहने से इकदम अलग है। कई दफा हम दूसरों से प्यार की वजह से खुद को प्यार करना भूल ही जाते हैं। रिश्तों की भाग – दौड़ में, खुद पीछे रह जाते हैं। किसी और को प्यार देने से पहले हमें सेल्फ लव सीख लेना चाहिए। और कोई नहीं तो सही, खुद को परिवार जैसा प्यार देना चाहिए।

आपका पेट फ्रेंड भी आपका परिवार ही है।

कितनी बार आप अकेले बैठ कुछ गुमसुम हो जाते हैं और आपका पेट अपने आप ही आकर आपसे लिपट जाता है, आखिर ऐसा परिवार के लोग नहीं करते तो और कौन करता है? आपका पेट – फ्रेंड एक मात्र ऐसा दोस्त होता है जो आपको जज नहीं करता, अगर आप एक बिल्ली के पैरेंट हैं तो वो कभी कभी भाव खा सकती हैं।

आप और आपके पार्टनर का प्यारा परिवार

एक परिवार कहलाने के लिए आपको शादी करने कि ज़रूरत नहीं है। भारत में लिव इन रिलेशनशिप लीगल हैं। प्यार और भरोसा, एक परिवार के लिए इतना ही काफी है। अब यहां सिर्फ़ स्ट्रेट कपल्स की बात नहीं हो रही, एक होमोसेक्सुअल कपल भी परिवार बनाता है। समाज को बदलती सोच के साथ चलने की सख़्त ज़रूरत है, वरना हम बदलाव के रास्ते पर पीछे रह जाएंगे।

तेरे जैसा यार कहां, कहां ऐसा याराना

दोस्तों के साथ रहना, फिर चाहे वो हॉस्टल में हो या फिर अपार्टमेंट में, बहुत ही यादगार होता है। दोस्त तो हमेशा से ही परिवार का हिस्सा होते हैं, एग्जाम की रात साथ में पढ़ने से, जॉब इंटरव्यू और ब्रेकअप के बाद संभालने तक, वो कभी छोड़ कर नहीं जाते। ये परिवार का प्यार खून के रिश्तों से कई ज़्यादा बढ़ा होता है। उनके साथ बनाई हुई रात 3 बजे वाली मैगी हर किसी के दिल के बहुत करीब होती है।

सिंगल पैरेंट और उनके बच्चे भी बनाते हैं भरपूर परिवार।

सिंगल पैरेंट्स को हमारे समाज में फेलियर की नजर से देखा जाता है। इस वजह से सिंगल पैरेंट्स और उनके बच्चों को काफ़ी झेलना पड़ता है। इक्कीसवीं सदी में ये स्टिग्मा हटाने की बहुत ज़रूरत है, हम सभी को अपने अंदर एक्सेप्टेंस लाने की ज़रूरत है। जिससे सभी सिंगल पैरेंट्स अपने परिवार के साथ सर उठा के जी सकें।

माता – पिता के साथ रहना, या खुद पैरेंट्स होना दोनों ही आपकी चॉइस होनी चाहिए, समाज का दबाव नहीं। परिवार क्या होगा, उस परिवार में कौन होगा इसके कोई नीयम नहीं हो सकते। प्यार को किसी भी दायरे में बांधा नहीं जा सकता। समाज के तय किए हुए डब्बों में हमें अपने रिश्तों को फिट करने की ज़रूरत नहीं है। हमारी समझ में फरक होने से, दूसरों की समझ गलत नहीं हो जाती। आगे बढ़ते रहने के लिए एक्सेप्टेंस होना बहुत जरूरी है। परिवार अपना है, तो चॉइस भी अपनी होनी चाहिए।

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