टीवी सीरियल्स से लेकर असल ज़िंदगी तक सास बहू में नोक झोंक देखना बहुत आम बात हो चुकी है लेकिन ऐसा क्यों है? शायद आपसी प्रतिस्पर्धा की वजह से। बहू के आने से सास घर में और बेटे की ज़िंदगी में अपनी पोज़िशन को लेकर इनसेक्योर हो जाती हैं। एक कारण ये भी है कि वो समाज के नियमानुसार बहू को कंट्रोल करके रखना चाहती हैं।

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पर क्या इस रिश्ते में प्यार नहीं पनप सकता? सास-बहू का रिश्ता भी मज़बूत हो सकता है अगर सास अपने ज़माने के रूल्स बहू पर न थोपे, उसे भी अपनी बेटी समझे। इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए सबसे पहले सास को अपनी बहुओं को ताने के रूप में कही जाने वाली कुछ बातों को बोलना बन्द करना होगा।

सास को अपनी बहू से क्या नहीं कहना चाहिए –

1. “तुम्हारी माँ ने कुछ सिखा कर नहीं भेजा”

सास अपनी बहू से ये एक्सपेक्ट करती हैं कि उसे घर का हर काम बखूबी करना आये इसीलिए ज़रा सी भी गलती होने पर माँ की परवरिश पर सवाल खड़े कर देती है। उन्हें ये समझना होगा कि ये ताना उनकी दकियानूसी सोच को दर्शाता है। हम अब उस समय में नहीं है जब बहू से “पर्फेक्ट” होने की उम्मीद रखना नॉर्मल था। बहू अगर जॉब करती है तो उसे घर के काम नहीं करने पर ताने मारना बिल्कुल गलत है। जब बेटे और बहू दोनो नौकरी करते हैं तो दोनों को घर का काम भी बराबरी से बाँटना चाहिए। और अगर बहू नौकरी नहीं भी करती तो भी वो इंसान है, उससे गलती हो जाना आम बात है। बात बात पर ताना मारने से दोनों के रिश्ते में दूरियाँ आती हैं। किसी को भी अच्छा नहीं लगता कि कोई उसके और उसकी माँ के बारे में भला-बुरा कहे।

2. “तुमने मेरे बेटे को बदल दिया”

“बहू के आते ही मेरा बेटा कितना बदल गया है”, ये बात लगभग हर दूसरी सास कहती है। ज़ाहिर सी बात है कि शादी के बाद हर किसी के जीवन में बदलाव आते हैं। शादी के बाद ज़िंदगी में पत्नी की अलग इंपोरटेंस होती है, उसे वक़्त देना पड़ता है लेकिन इस देश की हर सास को लगता है कि उसका बेटा बेहद मासूम है और बहू ने उसके बेटे को अपने वश में कर लिया है। ये मानसिकता ही सास और बहू को करीब नहीं आने देती।

3. “शादी को इतना समय हो गया, बच्चे कब होंगे”

बच्चे कब होंगे, कितने होंगे, होंगे भी या नहीं, यह फैसला पूरी तरह से कपल का होना चाहिए क्योंकि बच्चा आने के बाद उन्हीं के जीवन में सारे बदलाव आएँगे। पर भारत में बच्चे को जन्म दिये बिना औरत का जीवन व्यर्थ माना जाता है। औरत का पहला कर्तव्य है वंश आगे बढाना (लड़का पैदा करना) और ऐसा न होने पर उसके सास ससुर और समाज द्वारा उसे “बाँझ” जैसी उपाधियाँ दे दी जाती हैं और अगर सच में बाँझ हो तब तो उसका जीना मुश्किल हो जाता है। बच्चा नहीं हुआ तो सास उसकी ज़िम्मेदार बहू को ठेहरा देती हैं। कई बार औरतें प्रेशर में आकर बच्चे कर लेती हैं, जबकी वो उसके लिए तैयार भी नहीं होती इसलिए सास को अपनी बहुओं को बच्चा न होने को लेकर ताना नहीं मारना चाहिए।

4. “घर की बहुयें बड़ों के सामने घूँघट करती हैं”

घूँघट एक कैद है, जिसे पितृसत्ता ने इज़्ज़त का चोला पहना दिया है और समस्या ये है कि औरतें ही इसकी रखवाली करती हैं। सास बहू को बड़ों के सामने घूँघट करने को कहती है जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं कहना चाहिए। औरतें घूँघट किये बिना भी बड़ों की इज़्ज़त कर सकती हैं, इज़्ज़त का सर ढँकने से कोई लेना देना नहीं। पुरुष तो कभी घूँघट नहीं करते फिर महिलाएँ क्यों करें? अगर बहू इस प्रथा को न अपनाने का साहस कर रही है तो सास को उसका साथ देना चाहिए।

5. “तुम्हारे माँ-बाप ने तो कुछ दिया ही नहीं “

दहेज लेना और देना कानूनी अपराध है, पर लोग इस कुप्रथा से बाज़ नहीं आ रहे। बहू दहेज लेकर ना आये तो सास-ससुर उसे ज़िंदगी भर कोसते हैं और कई बार तो दहेज मिलने पर भी संतुष्ट नहीं होते। बहू को बहुत टॉर्चर किया जाता है, कई बार तो उसकी जान तक ले ली जाती है। सास को अपनी बहू के साथ भी बेटी जैसा बर्ताव करना चाहिए, उसकी माँ बनने की कोशिश करनी चाहिये और उसकी वैल्यू को दहेज से नापना बन्द कर देना चाहिए।

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