समाज की 5 बातें जो मैं सुनकर थक चुकी हूँ

Published by
Hetal Jain

समाज एक ऐसे लोगों का समूह है जिनकी संस्कृति, सभ्यता, मान्यताएं आदि एक-दूसरे से मिलती हो और जो परस्पर विकास हेतु कार्य करते हों। हर समाज के अपने नियम, कानून, मान्यताएं व अपेक्षाएं विभिन्न होती है। समाज की इतनी सारी बातें हैं जो मैं सुनकर थक चुकी हूं और उन्हें इतना संक्षेप में बताया भी नहीं जा सकता। फिर भी मैं यहां कुछ बातों पर रोशनी डालना चाहती हूं – समाज की पिछड़ी सोच

 1) पीरियड्स – इसे मासिक धर्म, माहवारी, मेंस्ट्रुएशन आदि भी कहते हैं। भारत एक उन्नत एवं प्रगतिशील देश है परंतु अभी भी लोगों के मन में पीरियड्स को लेकर सोशल stigma, परेज्यूडिसस एवं अंधविश्वास है। मेरा मानना है कि पीरियड्स उतनी ही प्राकृतिक एवं जैविक प्रक्रिया है जितना कि सांस लेना या भूख लगना। इस समय महिलाओं को मंदिर व किचन में प्रवेश न करने देना, उन्हें अपवित्र समझना, आदि प्रतिबंध लगाना हमारी पिछड़ी सोच को दर्शाता है।

2) रंग के आधार पर भेदभाव

हमारे समाज में गोरे लोगों को ही कामयाब माना जाता है और मैट्रिमोनियल एड्स में भी गोरी लड़कियों की मांग आदि हमारी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। किसी भी व्यक्ति का रंग उसकी जेनेटिक इनहेरिटेंस अथवा भौगोलिक स्थिति पर आधारित होता है। इस प्रकार के व्यवहार से किसी व्यक्ति की भावनाओं को क्षति पहुंच सकती है एवं उसका आत्मविश्वास डगमगा सकता है। व्यक्ति को अपने  निर्णय लेने की प्रक्रिया में निष्पक्ष होना चाहिए ना कि अपने रंग में।

3) कुकिंग, क्लीनिंग आदि कार्य

ये उन जीवन कौशल शिक्षाओं में आता है जो सभी को आनी चाहिए। सभी प्रकार के कार्य करने आना व्यक्तित्व के विकास होता है परंतु यह सारे काम हमने लिंग के आधार पर बाँट रखें हैं जो की गलत है। समाज लड़कों से आजीविका हेतु कार्य करने और लड़कियों से घर संभालने की अपेक्षा रखता है। माता- पिताओं को बचपन से अपने बच्चों को सभी कार्य सीखाने चाहिए।

4) शादी एवं शिक्षा

आज भी किसी लड़की का सही उम्र में शादी एवं बच्चे कर लेना ही सम्मानीय माना जाता है। इसी के चलते उसे पढ़ाई से वंचित रखा जाता है और उसका विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध, उम्र से पहले कर दिया जाता है। क्यों आज भी समाज ‘इस उम्र’ को तय करता है? व्यक्ति को अपनी स्वेच्छा एवं स्वतंत्रता से कार्य करने की अनुमति होनी चाहिए।

5) नियम एवं प्रतिबंध

एक लड़की को उसके पहनावे, उठने-बैठने, समय से घर आने आदि की शिक्षा दी जाती है परंतु यह प्रतिबंध लड़को पर लागू नहीं होते। हमें ऐसी सोच और नज़रिये को बदलने की जरूरत है।

उपरोक्त विषय काफ़ी गंभीर है और इस पर खुलकर चर्चा होना अति आवश्यक। ऐसी सोच को बदलने के लिए फेमिनिज्म या नारीवाद, लैंगिक समानता आदि जैसे आंदोलनों की सख्त ज़रूरत है। समाज की पिछड़ी सोच

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