महिलाओं में पीरियड्स के दौरान सेनेटरी नैपकिन कपड़ा इस्तेमाल करने से ज्यादा बेहतर माना जाता है। जैसे हर सिक्के का दूसरा पहलु होता है वैसे ही सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करने के फायदे के साथ साथ नुकसान भी होते हैं। इसका सबसे बड़ा नुक्सान होता है पर्यावरण और स्वास्थय को। सेनेटरी नैपकिन के नुकसान यहाँ दिए गए हैं.

पर्यावरण के लिए हानिकारक

भारत में महिलाओं की आबादी तीन करोड़ से भी ज्यादा है जिसमे से 12 करोड़ के लगभग महिलाएँ सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करतीं है। हर महिला हर महीने सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करती है तो सोचिए की कितने अरब पैड्स पर्यावरण में कचड़े के तौर पर जगह जगह फेक दिए जातें है। पैड्स की प्लास्टिक कई सालों तक ऐसे ही पर्यावरण में पड़े रहतें हैं क्योंकि इस में इतनी अधिक मात्रा में प्लास्टिक होती है की उसका ब्रेक डाउन नहीं हो पाता और वो मिट्टी में मिल नहीं पाता। कोई भी चीज़ अगर ब्रेक-डाउन हो कर पर्यावरण में मिल जाती है तो उसे पर्यावरण के लिए अच्छा माना जाता है।

स्वास्थय के लिए हानिकारक

एक्टर अक्षय कुमार की फिल्म पेडमेंन आने के बाद जो की सानिटरी नैपकिन पर आधारित है कई सर्वे किये गए। इन सर्वे से जानकारी मिलती है की सेनेटरी नैपकिन में 90 फीसदी प्लास्टिक होती है जो नुकसान दायक होती है। प्लास्टिक के साथ साथ सेनेटरी नैपकिन में डाइऑक्सिन , फुरन और पेस्टिसाइड जैसी कई केमिकल्स मौजूद होते हैं जो स्वास्थय के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। पीरियड्स ख़तम होने के बाद महिलाओं में रैशेज, खुजली, जलन और इन्फेक्शन जैसी चीज़ें देखी गयीं हैं जो सेनेटरी नैपकिन मैं मौजूद केमिकल्स और प्लास्टिक के लगातार इस्तेमाल की वजह से होती हैं। पीरियड्स पांच से सात दिनके होते हैं और हर 28 दिन में होतें हैं तो सोचिए की कितनी बार प्लास्टिक का इस्तेमाल हम साल भर में करतें हैं जिसके कारण तमाम प्रकार की बीमारियां होती हैं। बीमारियां होने की वजह से नुकसान दायक दवाईयाँ कहानी पढ़ती हैं जिस से शरीर ख़राब होता है।

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