बाथरूम में एक अजीब-सी बदबू आ रही थी।  उसके कपड़ों में उसी के खून के कुछ निशान लगे थे।  उसके पांवों में बेइंतहां दर्द हो रहा था। अपने कमरे के एक कोने में, दीवार का सहारा लिए, वो पाँव फैलाए बैठी थी।  कोस रही थी ऊपरवाले को कि आखिर उसने उसे लड़की क्यों बनाया। पिछले तेरह सालों से हर महीने के हर तीन दिन वह यही करती है- अपने अस्तित्व पर एक सवालिया निशान।

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और फिर लगाए भी क्यों नहीं? हर महीने वो न सिर्फ मासिक धर्म (पीरियड्स) की शारीरिक और मानसिक यातनाओं को सहती है,बल्कि हमारे समाज की बचकानी प्रथाओं के बोझ को भी झेलती है।

पीरियड्स के दौरान भारतीय लड़कियों और महिलाओं के साथ किसी दूसरे दर्जे के व्यक्ति की भांति व्यवहार किया जाता है। पीरियड्स के दौरान-

  • उसे रसोई घर में जाने की अनुमति नहीं है।
  • पूजा घर में भी उसका प्रवेश वर्जित है।
  • अपने घर के हर कमरे में वो नहीं जा सकती।
  • किसी भी बिस्तर पर वो नहीं बैठ सकती।
  • अपने झूठे बर्तनों को बाकी  बर्तनों के साथ नहीं मिला सकती।
  • पारिवारिक, सामाजिक समारोह में बढ़ चढ़कर हिस्सा नहीं ले सकती और न जाने क्या क्या।

आप सोच रहे होंगे की ये सब तो भारत के गांवों में होता होगा। आपकी जानकारी के लिए ये बताना चाहूंगी की आप गलत सोच रहें है। इन प्रथाओं का भारत के शहरों में भी अनुसरण किया जाता है। न सिर्फ अनुसरण, बल्कि पागलों वाला अनुसरण।  और छोटे मोटे शहरों में ही नहीं, बल्कि बड़े बड़े शहरों में भी।

पीरियड्स को क्यों छिपाना ? अगर मैं सेनेटरी नैपकिन्स का उपयोग कर रही हूँ, तो मुझे यह छुपाने कि ज़रूरत क्यों है? मुझे अपनी थैली को छुपाने की ज़रूरत क्यों है? मुझे काले रंग की थैली के उपयोग की ज़रूरत क्यों है?

इन प्रथाओं के खिलाफ होने वाले विरोध को सुना ही नहीं जाता। अगर सुना भी जाए तो हमारे समाज एवं धर्म के ठेकेदार जवाब देते हैं कि ये प्रथाएँ हमारे धर्म का हिस्सा है, ये प्रथाएँ हमारी सभ्यता का हिस्सा है।

काफी मनन के बाद भी ये समझ नहीं आया कि कौनसा धर्म, कौनसी सभ्यता ये कहती है कि अगर पहले से कोई औरत मासिक धर्म का दर्द झेल रही है तो हमें उसे हमारी निर्दयी प्रथाओं से और दर्द देना चाहिए।

और अगर कोई धर्म/ सभ्यता ऐसी कठोर, नासमझ प्रथाओं का अनुसरण करने की सलाह देता/ देती  भी है तो हमें उस धर्म या सभ्यता का पालन क्यों करना चाहिए? ऐसी प्रथाओं का पुरज़ोर विरोध क्यों नहीं होना चाहिए? ऐसी प्रथाओं को क्यों नहीं बदला जाना चाहिए? 

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अपने उपयोग में लिए हुए सेनेटरी पैड्स को वो फेंकना चाहती थी।  लेकिन समझ नहीं पा रही थी कि कैसे फेंके। आँगन में भाई बैठा था। बाथरूम के आसपास पिताजी घूम रहे थे। थैली का रंग भी तो सफ़ेद था, अगर किसी ने देख लिया फिर? आज तो कचरा लेने भी भैयाजी आएँगे; अगर थैली डस्टबिन में जाते हुए खुल गयी तो? अगर किसी को ये पता लग गया कि  पैड् (Pad)  मैंने फेंका है, फिर? और न जाने ऐसी कितने सवाल।

इन सवालों से बचने के लिए हमे काफी सीख दी जाती है, जैसे कि

  • उपयोग किये हुए पैड्स (pads) को काले रंग की थैली में डालना चाहिए;
  • सबके सुबह उठने से पहले ही थैली घर से बाहर फेंक देनी चाहिए;
  • घर के बड़ों के सामने न थैली को फेंकना चाहिए न थैली का जिक्र करना चाहिए;
  • कोशिश करनी चाहिए कि थैली इस ढंग से फेंकी जाए  कि किसी को पता न चले कि थैली मैंने फेंकी है।
  • कुल मिलकर इस तरह से बर्ताव करना चाहिए कि जैसे कुछ हुआ ही न हो।

लेकिन क्यों?

अगर मेरे पीरियड्स चल रहे हैं तो उन्हें छुपाने कि क्यों ज़रूरत है? अगर मैं सेनेटरी नैपकिन्स का उपयोग कर रही हूँ, तो मुझे यह छुपाने कि ज़रूरत क्यों है? मुझे अपनी थैली को छुपाने की ज़रूरत क्यों है? मुझे काले रंग की थैली के उपयोग की ज़रूरत क्यों है?

जब ये बात पूरी दुनिया को पता है की महिलाऐं हर महीने मासिक धर्म के दौरान पैड्स का उपयोग करती है तो यही बात हमें अपने घर वालों से क्यों छुपानी है? क्यों हम खुलकर अपने भाई या पापा को यह नहीं कह सकते की हमारे पीरियड्स चल रहे हैं? क्यों हम उन्हें ये नहीं बता सकते कि पीरियड्स कि वजह से हमें बहुत दर्द हो रहा है? क्यों हम उनके सामने अपनी थैली फेंकने नहीं जा सकते?

आखिर किस चीज़ का है यह पर्दा? क्यों है ये पर्दा? कब तक रहेगा ये पर्दा? क्यों न मिलकर उठा फेंके ये पर्दा? 

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दुकान वाले भैया से वो पैड्स खरीदना चाहती थी। लेकिन हिम्मत नहीं कर पा रही थी। सोच रही थी की दुकान वाले भैया क्या सोचेंगे; आस पास खड़े लोग क्या सोचेंगे। शर्म से पानी पानी हुए जा रही थी। बार बार कोशिश करती भैया को आवाज लगाने कि लेकिन हर बार फुसफुसा कर रह जाती।  कभी सोचती कि जब सब लोग अपना सामान ले लेंगे तब वो भैया से पैड्स (sanitary pads) मांग लेगी और कभी सोचती कि अभी ज़ोर से शेरनी की तरह दहाड़ेगी और भैया से पैड्स मांग लेगी । सोच में इतनी डूब गयी थी कि भैया ही बोले, ‘मैडम, क्या लेंगी?” सकपकाती हुई वो बोली, ‘भैया एक डिस्प्रिन दे दो।” डिस्प्रिन का पत्ता लिया और वह निकल गयी।

न जाने कितनी ही लड़कियों की है यह कहानी। हिम्मत ही नहीं कर पाती चार लोगों के बीच में पैड्स मांगने की, पैड्स खरीदने की।

कितनी अजीब बात है ये की जिन्हे ये पैड्स उपयोग करने होते हैं, वो अपनी शर्म के मारे ये बोल तक नहीं पाती हैं और जिन लोगों से वो शर्म करती है वो लोग बड़ी ही आसानी से उसे बेच देते हैं।

अद्धभुत है हमारे समाज का तानाबाना ! 

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