विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सोमवार को बताया की लम्बे समय तक काम करने से हर साल कई लोगों की मृत्यु हो रही है। ये आकड़ें कोविड के इस वर्क फ्रॉम होम के ज़माने में और चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहली बार काम के प्रेशर से बाद रहीं मृत्युदर पर हुए शोध के रिजल्ट्स सोमवार को प्रकाशित किये।

पहली बार हुआ है ऐसा शोध

एनवायरनमेंट इंटरनेशनल के एक पेपर में ये बात सामने आयी है की वर्ष  में लगभग 7,45,000 लोगों की मृत्यु जो स्ट्रोक और हृदयरोग से हुई है उनकी मृत्यु का मुख्य कारण लम्बे समय तक काम करना था। ये वर्ष 2000 में हुए शोध से 30 प्रतिशत ज़्यादा है। इस शोध में ये बात भी सामने आयी है की लम्बे समय तक काम करने से होने वाली बिमारियों में लगभग 72 प्रतिशत आदमियों में देखी गयी है।

क्या कहना है विश्व स्वास्थ्य संगठन का ?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एनवायरनमेंट और क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट की डायरेक्टर का कहना है की एक हफ्ते में 55 घंटे से ज़्यादा काम करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उन्होंने ये भी बताया की इस बात का खुलासा करने के पीछे उनका उद्देश्य यहीं है की विश्व में सारी कंपनियां अपने यहाँ काम करनी वाले लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल रखें।

कौन है अधिक खतरे में ?

शोध ये बताते हैं की दक्षिणपूर्वी एशियाई देश, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया के निवासी ज़्यादा लम्बे समय तक काम करते हैं और इस कारण उनके लिए परेशानी ज़्यादा है। कुल 194 देशों में ये पाया गया है की 55 घंटे से ज़्यादा काम करने पर 35 प्रतिशत स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है और 17 प्रतिशत हृदयरोग का खतरा बढ़ गया है। ये शोध 2000-2016 के बीच के समय के लिए किया गया था और इसमें कोविड के समय का हाल नहीं है।

क्या है कोरोना के समय का हाल ?

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया की इस कोरोना के समय में घर पर रह कर दिन भर काम करने के ट्रेंड में बहुत बढ़ाव देखा गया है। शोध ये बताते है की इस वक़्त काम से काम 9 प्रतिशत लोग दुनिया भर में अपने काम के निर्धारित समय से ज़्यादा काम कर रहे हैं। अगर इस वर्क फ्रॉम होम के समय में भी ये काम के घंटों को घटाया नहीं गया तो भविष्य में इनके कारण बहुत बुरा हाल हो सकता है।

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