प्रयोग, प्रतिरोध और स्त्रीत्व पर कलाकार शिबानी सहगल की बेबाक बातें

SheThePeople से बातचीत में शिबानी सहगल ने बताया कि कैसे दीवारों पर की गई साधारण रेखाओं से लेकर आज उनके अपने आत्म-प्रतिबिंब तक उनकी कला समय के साथ बदली।”

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Rajveer Kaur
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Artist Shibani Sehgal

शिबानी सहगल के लिए कला कभी एक सोचा-समझा फैसला नहीं रही। यह अपने आप उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बनती चली गई। बचपन में दीवारों पर की गई छोटी-छोटी रेखाओं से लेकर स्कूल और कॉलेज में कला प्रतियोगिताएँ जीतने तक, रचनात्मकता उनके लिए एक स्वाभाविक रास्ता थी।

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प्रयोग, प्रतिरोध और स्त्रीत्व पर कलाकार शिबानी सहगल की बेबाक बातें

इस सफर ने उन्हें औपचारिक कला शिक्षा तक पहुँचाया। उन्होंने दिल्ली के कॉलेज ऑफ आर्ट से बीएफए किया और बाद में नेशनल म्यूज़ियम इंस्टिट्यूट से आर्ट हिस्ट्री में एमए पूरा किया, जहाँ उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया।

SheThePeople से बातचीत में शिबानी कहती हैं, “कला मेरी पहचान और मेरी भाषा है।” प्रकृति, साहित्य और स्मृतियों से प्रेरित उनका काम उनके आत्मबोध का प्रतिबिंब है। बच्चों के जन्म के बाद शिबानी ने कुछ समय के लिए पेशेवर कला से दूरी बना ली। लेकिन 2017 में जब उन्होंने दोबारा पेंटिंग शुरू की, तो कला उनके लिए एक नए उद्देश्य के साथ लौटी।

वह बिना किसी तय योजना के, सहज रूप से पेंटिंग करती हैं। कैनवास पर आकार, रेखाएँ और बनावट अपने आप उभरती हैं—ठीक वैसे ही जैसे प्रकृति में सब कुछ स्वाभाविक रूप से होता है।

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उनकी कला में पक्षी और फूल बार-बार दिखाई देते हैं, जो स्वतंत्रता, नाज़ुकता और पुनर्जन्म के प्रतीक हैं। धात्विक रंगों की परतें उनकी पेंटिंग्स में चमक और बदलती रोशनी जोड़ती हैं।

कला और स्त्रीत्व

एक ऐसे समाज में जहाँ महिलाओं को अक्सर सीमाओं में बाँधने की कोशिश की जाती है, शिबानी की मुक्त और बेबंध प्रकृति वाली पेंटिंग्स स्त्री की स्वतंत्रता और पहचान को दोबारा हासिल करने जैसा प्रतीक बन जाती हैं।

शिबानी कहती हैं, “प्रकृति मेरे भीतर की स्त्री का विस्तार और पूर्णता है। ‘प्रकृति’ और ‘पुरुष’ का संतुलन मुझे मेरे स्त्रीत्व में विश्वास और शक्ति देता है।”

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उनके लिए तय सीमाओं में न रहना अपनी अलग पहचान को स्वीकार करना है। शिबानी मानती हैं कि कला प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि भीतर की सच्चाई को व्यक्त करने का माध्यम है।

उन्होंने साझा किया, “मेरी कला में प्रयोग तब शुरू हुआ जब मैंने अपने पुराने कामों को काटकर, उनसे नई परतें और कोलाज बनाए। इससे नए विचार और नए रूप सामने आए”।

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अपने पुराने कामों को नए रूप में ढालकर शिबानी अपने रचनात्मकता के ‘पुनर्जन्म’ को दर्शाती हैं। उनकी अनोखी कला एक ऐसे समाज में उनकी व्यक्तिगत पहचान का भी प्रतीक है, जहाँ महिलाओं से अक्सर पूर्वानुमेय होने की उम्मीद की जाती है।

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कला की दुनिया में तकनीक

हर उद्योग की तरह कला की दुनिया भी तेजी से तकनीक के साथ बदल रही है। आज, जब AI केवल एक क्लिक में कला तैयार कर सकता है, शिबानी मानती हैं कि मानव रचनात्मकता और मशीन द्वारा बनाई गई कला में स्पष्ट अंतर है।

“AI केवल वही दोहरा सकता है जो पहले से सोचा गया है,” उन्होंने कहा, और कला में मानवीय अंतर्ज्ञान की भूमिका पर जोर दिया। “एक कलाकार, खासकर प्रयोगात्मक कलाकार, हमेशा कुछ नया देने में सक्षम होता है।”

शिबानी के लिए तकनीक एक साधन है, रचनात्मकता का विकल्प नहीं। यह उनके काम को दस्तावेज़ करने और दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचाने में मदद करती है, और भौतिक सीमाओं से परे कैनवास का विस्तार करती है।

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एक कलाकार के रूप में विकास

पीछे मुड़कर देखती हैं, तो शिबानी अपने सफर में संतोष महसूस करती हैं। बच्चों की परवरिश के दौरान पेशेवर कला से दूर बिताए गए सालों ने उनकी रचनात्मक आवाज़ के साथ जुड़ाव को और गहरा किया।

जब उनसे पूछा गया कि वह अपने कला स्कूल के समय की खुद की युवा ज़िन्दगी को क्या सलाह देतीं, तो शिबानी ईमानदारी से बताती हैं, “छात्र के तौर पर मैं अंतर्मुखी थी और कॉलेज के महान शिक्षकों से कम ही बातचीत करती थी।”

“मैं युवा कलाकारों को यही कहूँगी कि इस अवसर को कभी न खोएँ,” शिबानी ने साझा किया। “अपने मन में उठ रहे सवाल पूछने से कभी न हिचकिचाएँ, भले ही आपको मूर्ख लगने का डर हो!”

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