इस पान्डेमिक में एक के बाद एक कई भूकंपों ने नेशनल कैपिटल टेरिटरी दिल्ली को हिला कर रख ही दिया है साथ साथ दिल्ली वालों के दिलों को भी दहला कर रख दिया है। बहुत साइंटिस्ट्स ने कहा है कि ये एक बड़े भूकम्प से पहले होने वाले छोटे मोटे भूकंप हैं।

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प्रश्न उठे कि क्या दिल्ली इस बड़े भूकम्प को झेलने के लिए दिल्ली तैयार है? वैसे तो भूकम्प के होने के कोई लक्षण पहले से नही दिखते और वो कभी भी अचानक होजाते हैं।

सिस्मोलॉजिस्ट कुसला राजेंद्रन

इन सब डाउट्स को क्लियर करने के लिए हमने जानी मानी सिस्मोलॉजिस्ट कुसला राजेंद्रन जो बैंगलोर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस में सेंटर फ़ॉर अर्थ साइंसेज में प्रोफेसर हैं उनसे बात की।

कुछ भी Unusual नहीं

कुसला भरोसा दिलाती हैं कि दिल्ली में जो भी हो रहा है उसमें कुछ भी ‘unusual’ नहीं है।

अगर जैसा कहा जा रहा है वो इतना सटीक होता तो कभी भी भूकम्प को प्रेडिक्ट करने में दिक्कत नहीं आती।

ऐसा कोई नॉर्म नहीं

हां ऐसा होसकता है कि किसी बड़े फाल्ट सिस्टम्स जो छोटे छोटे फाल्ट सिस्टम्स से जुड़े हों, इससे ये भूकम्प के हल्के झटके बड़े झटके का रूप ले सकते हैं। पर ये नॉर्म नहीं है।

कभी भी किसी भी तरह का भूकम्प आसकता है हल्के झटके आसकते हैं बिना किसी बड़े झटके में बदले हुए (जैसा कि पालघर,खांडवा) और बड़े भूकम्प आते हैं बिना हल्के झटकों के ।

दिल्ली में बड़े भूकम्प की कोई संभावना नहीं

प्रोफेसर कहती हैं “ये सब क्षेत्र के स्ट्रक्चरल और टेकटोनिक सेटिंग्स पर निर्भर करता है और दिल्ली में मुझे ऐसी कोई संभावना नहीं दिखती।”

क्या भूकम्प की प्रेडिक्शन हमें भूकम्प से बचा सकती है? हम भूकम्प के लिए क्या क्या तैयारी कर सकते हैं?

प्रेडिक्शन का मतलब होता है कि हमें पता चले कि कब कहाँ और कितना बड़ा भूकम्प आने वाला है ताकि लोगों को उस जगह से हटाया जा सके। पर ऐसा कोई तरीका दुनिया में नहीं है जो भूकम्प को प्रेडिक्ट कर सके।

हां पोटेंशियल क्षेत्रों और शायद मैग्नीट्यूड का भी पता चल सकता हैं जहाँ भूकम्प आसकता है और कितना आसकता है। पर भूकम्प का टाइम भी नहीं पता चल सकता है इसलिए साइंटिस्ट्स विंडोज़ बताते हैं जैसे 50 साल।

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