पीरियड लीव्स का मतलब है कि महिलाओं को उनके पीरियड्स के दौरान छुट्टी देना क्योंकि जितनी आसान टी.वी की सेनेटरी पैड्स की advertisement होती है , उससे कई ज्यादा दर्द एक महिला पीरियड्स के दौरान सहती है जिससे महिला का productivity level अचानक से गिर जाता है और सर दर्द , एब्डोमिनल क्रैम्प्स (abdominal cramps ), चिंता , सुस्ती और एनर्जी (energy ) का कम होना आम बात है ।

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2017 में एक साइंटिस्ट ने पीरियड के दर्द की तुलना हार्ट अटैक के लक्षणों से की और लंदन की “हेल्थ यूनिवर्सिटी” के प्रोफेसर John Guillebaud के अनुसार भी cramping pain हार्ट अटैक के दर्द के बराबर है । काफी समय से महिलाऐं , इस मुश्किल वक्त में भी काम करती आ रही है , अपने abdominal दर्द को सहते हुए या फिर पेनकिलर्स लेते हुए क्योंकि उन्हें काम को साधारण पीरियड प्रॉब्लम के लिए स्किप (skip ) करना शर्मनाक लगता है । कई महिलाओं को पीरियड्स की वजह से छुट्टी की बात करने में अपमान (humiliation ) महसूस होता है और इसी कारण वो अपनी हेल्थ से कोम्प्रोमाईज़ करती है और चुप चाप मुश्किल समय में भी काम करती रहती है ।

पीरियड्स वाले दिनों में एथलीट को 4 या 5 दिन तक बिलकुल भी हार्ड ट्रेनिंग नहीं दी जाती है और हमारे दर्द के अनुसार ट्रेनिंग को एडजस्ट(adjust ) कर दिया जाता है । – दुती चंद

पीरियड लीव्स को लेकर दुती चंद के विचार 

दुती चंद एक इंडियन प्रोफेशनल स्प्रिंटर है और “वूमेन 100 मीटर्स इवेंट” की  नेशनल चैंपियन । वो इंडिया की तीसरी महिला रही जो की “Summer Olympic Games ” के 100 मीटर इवेंट में टिक पायी और जित पायीं । वो पीरियड लीव्स के बारे में कहती है की , “उन्हें भी 1 या 2 दिन का रेस्ट दिया जाता है , जब उन्हें या किसी और वूमेन प्लेयर को पीरियड्स होते है या फिर हम ट्रेनिंग करते भी है तो वो हर दिन की तरह की जाने वाली ट्रेनिंग नहीं होती । पीरियड्स के दौरान शरीर में दर्द होने से , हमारा शरीर काफी कमजोर हो जाता है और अगर हमें
इन दिनों ज़्यादा वर्कआउट करने के लिए बोला जाता है तो हमारी बॉडी ब्रेक डाउन हो जाती है और इससे हमारी परफॉरमेंस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ते है ।

पीरियड्स की वजह से हमारे कोच हमें 1 या 2 दिन का रेस्ट दे देते है और जब एथलिट कहती है की वो अब ठीक हो चुकी है और अब दौड़ सकती है , तभी कोच एथलिट को दौड़ने की अनुमति देते है । पीरियड्स वाले दिनों में एथलिट को 4 या 5 दिन तक बिलकुल भी हार्ड ट्रेनिंग नहीं दी जाती है और हमारे दर्द के अनुसार ट्रेनिंग को एडजस्ट(adjust ) कर दिया जाता है ।

हर लड़की की शारीरिक क्षमता अलग होती है और हर लड़की का शरीर अलग होता है इसीलिए महिलाएं अलग अलग लेवल के दर्द को अनुभव करती है , जिसके अनुसार ट्रेनिंग में कुछ बदलाव कर दिए जाते है , जिससे एथलिट की हेल्थ बिगड़े नहीं । एक एथलीट के लिए ट्रेनिंग बहुत आवश्यक है और वूमेन जो ज़्यादा दर्द महसूस कर रहीं हो वो कोच को खुल कर इस बारे में बता सकतीं है , की उनके लिए ट्रेनिंग करना मुश्किल हो रहा है और इस मामले में कोच भी बहुत सपोर्ट और मदद करते है और वो इस मामलें में कभी भी दबाव नहीं डालते ।

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