सोशियोलॉजिस्ट्स की मानें तो विवाह की स्थापना सोसाइटी को ऑर्गनाइज़ करने के लिए की गयी थी किंतु आज जो हिंदू विवाह का स्वरूप नज़र आता है उसे देख कर लगता है कि शादी का सोल परपज़ औरतों को समाज में उनकी जगह दिखाना है (जो वाकई बहुत नीचे है)।
वैसे तो पैदा होने से लेकर मरने तक फॉलो किये जाने वाले हर धर्म के हर संस्कार के रूह में पितृसत्ता का वास है लेकिन शादी की तो सारी रस्में ही जैसे न केवल स्त्री के अधिकार बल्कि उसका आत्मसम्मान तक निचोड़ने के लिए बनी हैं।

स्त्री को बचपन से ये सिखाया जाता है कि वो जो भी करे, फ्यूचर में अच्छा पति पाने के लिए करे। खाना बनाना सीखो ताकि पति और बच्चों का पेट भर सको, नौकरी न करो तो शादी के लिए, नौकरी करो तो शादी के लिए। हमारा चलना, उठना, बैठना, हँसना, रोना सब कुछ मर्यादा में होना चाहिए वरना शादी कौन करेगा? और समाज को लगता है कि शादी किये बिना तो स्त्री का जीवन ही व्यर्थ है।

वैसे तो हिंदू शादी में कई छोटी बड़ी रस्में होती हैं, लेकिन यह हैं हिंदू विवाह के प्रमुख चार रस्में

1. कन्यादान

समाज एक पल में स्त्री को देवी बना कर सर पे बैठा लेता है और दूसरे ही पल सर से पटक कर वस्तु बना देता है। कन्यादान एक ऐसा कोमोडीफिकेशन है जिसे खुशी-खुशी स्वीकार लिया जाता है। स्त्री खुद समाज के इस दोगलेपन को समझ नहीं पाती इसलिए सड़क चलते कोई “माल” बोलदे तो तुरंत भड़क उठती है परंतु जब पूरे समाज के सामने उसके इंसानी रूप को अस्वीकार करके उसे सामान बनाया जाता है, तब कुछ नहीं कहती।

कन्यादान को महादान भी कहा जाता है और क्यों न कहा जाए, किसी इंसान से उसकी ऑथोरिटी छीन कर उसका दान करना कोई छोटी बात तो है नही। सुभद्रा कुमारी चौहान के बारे में पढ़ रही थी, तब पता चला कि उन्होंने अपनी बेटी का कन्यादान नहीं किया था क्योंकि “कन्या कोई वस्तु नहीं है जिसका दान कर दिया जाए”। हम उनके समय से बहुत आगे आ चुके हैं और आज सब कुछ जानते समझते हुए भी इस रस्म का चुप चाप पालन कर लेने में कोई तर्क नहीं है।

2. दहेज

लड़की के घरवाले, लड़के के घरवालों को दहेज देते हैं क्योंकि “बेटी बस देना काफ़ी नहीं है”। पढ़े लिखे लड़के हों या अनपढ़, लड़की उनसे ज़्यादा कमाती हो या कम, दहेज के लिए मुँह खोलने में ज़रा भी नहीं शर्माते। दहेज लेना और देना भारत में अपराध है पर लोग खुल कर माँगते हैं और खुल कर देते हैं। आज दहेज लड़के की वैल्यू बन चुका है। जैसा लड़का, वैसी उसकी कीमत। ये कीमत न चुकाने पर डाउरी डैथ्स भी हो जाती हैं यानी कि लड़की के ससुराल वाले या तो उसे मार देते हैं या वो खुद तंग आकर सुसाइड कर लेती है।

दहेज का इतना प्रिवेलेंट होना ये दर्शाता है कि आज भी शादी में लड़की की वैल्यू लड़के से कम है इसलिए यदि आपको अपनी सेल्फ-रिस्पेक्ट से प्यार है और आप अपनी शादी में बराबरी चाहते हैं तो दहेज नाम की कुप्रथा का त्याग कर दीजिये।

3. बिदाई

मुझे ये बात कभी पसंद नहीं थी कि शादी के बाद लड़की को अपना घर छोड़ना पड़ता है। इस रस्म के मुताबिक “बेटियाँ पराया धन होती हैं” जिन्हें बिदाई के बाद “अपने घर”(ससुराल) जाना होता है। आज लड़कियाँ अपनी पैत्रिक सम्पति में बराबर की अधिकारी होती हैं लेकिन आज भी वे अपने हिस्से की प्रॉपर्टी भाईयों को दे देती हैं क्योंकि उनके दिमाग में ये भर दिया गया है कि वो पराई हैं। लड़कियाँ चाहें भी तो अपने पैरेंट्स की सेवा नहीं कर पातीं क्योंकि उनका धर्म अपने ससुराल वालों की सेवा करना है।

ये रस्म एकदम बकवास है। स्त्री न तो धन है, जिसका मालिकों द्वारा आदान-प्रदान किया जा सके और न पराई है, जिसका बिदाई करके मायके से रिश्ता तोड़ा जा सके। स्त्री भी उतनी ही मनुष्य है, जितना कि उसे दान में ले जाने वाला पति और उसका भी अपने घर पर उतना ही अधिकार है जितना कि उसके भाई का।

4. सिंदूर

सिदूर और मंगलसूत्र के बिना शादी अधूरी मानी जाती है। शादी में पति पत्नी की माँग में सिंदूर भरकर उसे ‘अपने जीने तक’ सिंदूर लगाने का हक देता है। शादी के बाद सिंदूर लगाना स्त्री का कर्तव्य है और ऐसा न करने पर उसे हर किसी से ताने सुनने पड़ते हैं। स्त्री श्रृंगार के नाम पर अपनी शादी लादे घूमती है जबकि पुरुष को ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता और ये श्रृंगार केवल तब तक जब तक पति ज़िंदा है, उसके मरने के बाद ये सब छीन लिया जाता है। मेरा मानना है कि सिंदूर लगाना हमारी चॉइस है, हमारा अपने श्रृंगार पर पूरा अधिकार है। माँग हमारी, सिंदूर हमारा तो इसे लगाने का अधिकार कोई और क्यों दे? हम जब चाहें, जो चाहें अपनी बॉडी के साथ कर सकते हैं।

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