Women Are Not Culprit: आखिर कब तक समाज पीड़ितों को दोषी ठहराता रहेगा?

हमारे देश की हर महिला और हर लड़की रानी लक्ष्मीबाई के बराबर तो है लेकिन अगर वे अपने खुले पंखों से आसमान में उड़ान भरने की चेष्टा रखती है तो उनका अपना समाज ही उनके पंख काटने से कतराता तक नहीं है।

Rajveer Kaur
23 Nov 2022
Women Are Not Culprit: आखिर कब तक समाज पीड़ितों को दोषी ठहराता रहेगा?

Women Are Not Culprit

जैसा कि देखा जा सकता है आज के आधुनिक एवं शिक्षित समाज में महिलाओं के साथ अपराध दिन- प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। हालात कुछ ऐसी हो गई है कि वे अपने रोजमर्रा के काम भी अकेले करने से कतराती हैं, चाहे वह नौकरी के लिए ऑफिस जाना है या घर के लिए सब्जी खरीदने ही सही। एक अपराध को सहने के साथ-साथ उन्हें डराया जाता है, धमकाया जाता है कि वे खुलकर अपनी आवाज उस अपराध के विरुद्ध ना उठा सकें। 

आखिर कब तक समाज पीड़ितों को दोषी ठहराता रहेगा

हर लड़की रानी लक्ष्मीबाई के बराबर 

हमारे देश की हर महिला और हर लड़की रानी लक्ष्मीबाई के बराबर तो है लेकिन अगर वे अपने खुले पंखों से आसमान में उड़ान भरने की चेष्टा रखती है तो उनका अपना समाज ही उनके पंख काटने से कतराता तक नहीं है। पग पग पर हुए अत्याचारों के लिए उन्हें पूर्ण रूप से दोषी ठहराया जाता है, उन्हें बतलाया जाता है कि उनके साथ ऐसा होना एक अनहोनी नहीं थी बल्कि यह सब उनकी अपनी वजह से हुआ है। आज के दिन हम सब 21वीं सदी में जी रहे हैं जहां पर मशीनीकरण तो लगातार बढ़ता जा रहा है लेकिन लोगों की सोच आज के दिन भी टस से मस नहीं हुई है।

कुछ समाज के ठेकेदार तो बर्बरता की हद पार करने वाले निर्भया रेप कांड के दौरान भी उस मासूम बच्ची को दोष दे रहे थे। आज के दिन भी लोग चुप कहां है ! वे श्रद्धा की मौत के लिए भी उसे खुद जिम्मेदार ठहराते हैं। वे प्रश्न पूछते हैं कि आखिर उसने दूसरे धर्म में जा कर प्रेम किया ही क्यों? उसने आफताब को छोड़ क्यों नहीं दिया? 

हमारा समाज हर पल, हर समय महिलाओं को एवं लड़कियों को उनके साथ हुई छेड़खानी या फिर बड़े से बड़े अपराध के लिए उन्हें खुद दोषी ठहरा कर दुविधा में डाल देता है। अपनों का सहारा ही ना पाकर न्याय पाने की दरख्वास्त तक नहीं करती और आखिरकार अपना एवं अपनी आत्मा का गला घोंट लेती है। वे अपनी बेटियों को भी उनके साथ होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने से मना करने लगती है। 

सोच-विचार का विषय

यह कितना सोच-विचार का विषय है कि हमारा शिक्षित वर्ग जो अपने आप को मॉडर्न बताता है, कूल बताता है वह खुद महिलाओं को हाशिए पर धकेलता जा रहा है। कभी महिलाओं और लड़कियों के कपड़ों को तो उनके घर देर आने के समय को दोष देने लगते हैं और यह पढ़े-लिखे परिवारों में भी सामान्य है। आखिर कब तक हमारा समाज दिल दहला देने वाले अपराधों के लिए महिलाओं को दोषी ठहराते रहेगा? आखिर कब तक?

समय आ गया है कि हम एकजुट हो जाए और अपनी बुलंद आवाज को महिलाओं और लड़कियों के उत्थान के लिए प्रयोग करें। जब भी कोई अनहोनी उनके साथ होती है तो उनको दोषी ठहराने की जगह, असल दोषियों को सजा दिलवाने के लिए मुहिम की शुरुआत करें क्योंकि जब दहाड़ेगी महिलाएं तभी तो बोलेगा इंडिया।

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