समय बीत रहा है, लड़कियां धीरे-धीरे इस पितृसत्तात्मक समाज में अपनी जगह बना रही है। आपको बता दें कि ये जगह आसानी से नही बल्कि काफी स्ट्रगल से बन रहा है। फिर लड़कियों को आगे बढ़ता देख कुछ लोग कहते है कि जी हमने तो अपने देश की लड़कियों को काफी छूट दे रखा है तभी तो हर फील्ड में वो लड़को से आगे है। ऐसे झूठ का वाह-वाही बटोरने वालों से सावधान! अगर इस समाज की लड़कियां आगे है भी तो केवल अपनी मेहनत और लगन से वरना इसी समाज के लोग तो लड़कियों की जिंदगी शुरू होने से पहले ही खत्म कर देते है सिर्फ इसलिए क्योंकि वो एक लड़की है। क्या..क्या कहा आपने की ऐसा अब नही होता! चलिए आपकी ये गलतफहमी भी दूर करते है।

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रांची, झारखंड से एक दिल झकझोरने वाली खबर आई है कि एक बाप ने अपनी डेढ़ साल की बच्ची को खुद मार डाला क्योंकि वह केवल एक लड़की थी और पिता को बेटी नही चाहिए थी। खबरों के अनुसार बच्ची का पिता जिसका नाम गौतम प्रसाद महतो है, इस शनिवार की सुबह बच्ची के रोने की आवाज़ से काफी गुस्सा हो गया और उसे उठा के पटक दिया। उसके बाद भी जब बच्ची चुप नही हुई तो इस शख्स ने मासूम का गला दबा कर उसे मार डाला। इन सब के दौरान बच्ची की मां बबीता ने उसे बचाने के लिए अपने पति को काफी रोकने की कोशिश की पर वो नाकाम रही। 35 साल का गौतम प्रसाद जो शराबी भी है, को पुलिस ने मर्डर के चार्ज में गिरफ्तार कर लिया है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार गौतम प्रसाद और बबीता की शादी 2014 में हुई थी और उनके 2 बच्चे थे- एक बड़ा बेटा और एक वो मासूम जिसकी जान उसके पिता ने ले ली। बबीता ने पुलिस को बताया कि उसका पति उस पर हमेशा गुस्सा करते रहता था क्योंकि उसने एक लड़की को जन्म दिया था। उसने बताया कि उसका पति हमेशा कहता था कि उसे बेटी नही चाहिए लेकिन फिर भी वो उसके साथ रहती रही कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा लेकिन गौतम के लड़ाई-झगड़े दिन-पर-दिन बढ़ते ही गये।

लड़कियों के खिलाफ बढ़ते खतरनाक क्राइम्स

रांची की यह खबर तब आई है जब भारत का ग्राफ लड़कियों के खिलाफ बढ़ते क्राइम में आसमान छू रहा है। यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 50 सालों में पूरे विश्व की 45.8 मिलियन लापता हुई लड़कियों में 142.6 मिलियन लड़कियां भारत की थी। The Telegraph रिपोर्ट के अनुसार ये लड़कियां जन्म के तुरंत बाद लापता होने वाली लड़कियां है।

भले ही हम कितना ही रट लें और सार्वजनिक दीवारों को ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के नारों से रंग दे लेकिन दिमागों में बेटे की चाह वाले विचारों को निकाल पाना काफी मुश्किल है। हर कीमत चुकाने को तैयार बैठे है बेटे की चाह में भले इसके लिए कितनी बेटियों की जान क्यों ना लेनी पड़े। इसी साल सितम्बर में एक खबर आई थी जहां 2 साल की बच्ची के शरीर पर screwdriver से 100 बार अटैक किया गया और फिर उसे शॉल में लपेट कर भोपाल के अयोध्या नगर के एक मंदिर के पास फेंक दिया गया। उसी हफ्ते भोपाल में ही और 2 छोटी बच्चियों का मर्डर किया गया था।

क्या पितृसत्ता छोटी बच्चियों पर हावी हो रहा है?

काफी अफसोस वाली बात है कि अगर कोई बच्ची अपने जन्म के कुछ महिनों तक ज़िंदा बच भी जाती है तो या तो वो किसी रेपिस्ट कि शिकार हो जाती है या किसी हिंसक पिता के हिंसा की। ये सब घटनाएं केवल एख ही सवाल उठाती है कि क्या इंडिया इस पितृसत्तात्मक सोच से बच पाएगा? क्या यहां लड़कियां अपने हक़ के लिए लड़ने के लायक हो पाएंगी या उऩका गला बचपन में ही घोंट दिया जाएगा? क्या यहां कि सरकार केवल अपना काला धन इंवेस्ट करने और अपनी योजनाओं की लिस्ट लंबी करने के लिए लड़कियों के लिए तरह-तरह की पॉलिसी बनाएगी या फिर उनकी सुरक्षा के लिए भी कोई कदम उठाएगी? ये सब सवाल बड़े लेवल पर पूछने की और एक्शन लेने की ज़रूरत है।

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